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Wednesday 25 November 2009

"दया" के महासागर और "मानवता" के मसीहा - एम. करुणानिधि (भाग-2) … Karunanidhi, Secularism, Human Rights, Terrorism (2)

(भाग-1 से आगे जारी…)

10 जून 2006 को केरल के मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन खुद करुणानिधि से मिलने चेन्नै पहुँचे और अब्दुल नासिर मदनी की सुरक्षित रिहाई की गुहार लगाई। हालांकि "दया के सागर" ने तत्काल उसे रिहा करने से मना कर दिया (शायद अन्नादुरै का जन्मदिन दूर होगा), लेकिन महानता की पराकाष्ठा को पार करते हुए करुणानिधि ने जेल में ही मदनी के लिये आयुर्वेदिक मसाज और चिकित्सा की व्यवस्था करवा दी (क्या कहा? आपको कसाब का AC और अफ़ज़ल का चिकन बिरयानी याद आ गया? मेरी गलती नहीं है)। अप्रैल 2007 में कोयम्बटूर बम विस्फ़ोटों की सुनवाई पूरी हुई जिसमें 1300 गवाहों ने बयान दिये। 1 अगस्त 2007 को मुकदमे का निर्णय आया और जैसा कि अपेक्षित था अब्दुल नासेर मदनी को सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया, जिसका केरल में एक हीरो की तरह स्वागत हुआ, बाशा, अंसारी तथा अन्य को सजा हुई, जिन्हें अब "दया के सागर" ने अन्नदुरै के जन्मदिन की खुशी में रिहा कर दिया। अब्दुल नासेर मदनी ने कहा कि वह कभी भी आतंकवादी नहीं था और अब वह राजनीति में आकर दलितों और मुस्लिमों (ज़ाहिर है) की सेवा करना चाहता है। मदनी ने भारी दरियादिली(?) दिखाते हुए कहा कि हालांकि तमिलनाडु सरकार ने उसे 9 साल जेल में रखा लेकिन वह इसके खिलाफ़ कोई मुकदमा दायर नहीं करेगा (आयुर्वेदिक मसाज के खिलाफ़ भी केस दायर होता है क्या?)।

केरल के बेशर्म वामपंथी नेताओं ने विधानसभा चुनावों में मदनी को एक हीरो बनाकर पेश किया। तमिलनाडु के सभी राजनैतिक दलों ने कोयम्बटूर बम विस्फ़ोटों के इस निर्णय पर चुप्पी साधे रखी, सरकार द्वारा तो उच्चतम न्यायालय में इसके खिलाफ़ अपील करने का सवाल ही नहीं था, जयललिता और भाजपा ने भी रहस्यमयी अकर्मण्यता दिखाई। बम विस्फ़ोट से पीड़ित परिवारों ने 18 जुलाई 2008 को इस फ़ैसले के खिलाफ़ एक याचिका दायर की है, लेकिन ऐसी सैकड़ों याचिकाएं भारतीय कोर्ट में कई सालों से चल रही हैं।
http://islamicterrorism.wordpress.com/2008/07/28/muslim-terrorists-target-sri-meenakshi-and-other-major-temples-in-tamil-nadu-security-tightened/

and

http://ibnlive.in.com/news/tamil-nadu-cops-foil-aug-15-terror-bid-arrest-one/69709-3.html?xml

सरकारों के इस मैत्रीपूर्ण रवैये की वजह से अलगाववादियों और देशद्रोहियों के हौसले इतने बुलन्द हैं कि इस वर्ष तमिलनाडु में कम से कम 14 जगह पर गणेश चतुर्थी के विसर्जन समारोह में कोई न कोई फ़साद या मारपीट हुई, जिसमें से एकाध-दो के बारे में करुणानिधि के लाड़ले अखबार और चैनलों "दिनाकरण" और "सन-टीवी" पर (मजबूरी में) दिखाये गये।



सबसे खतरनाक बात यह कि सरकार के समर्थन से MNP (मनिथा नीधि पसाराई) नामक अलगाववादी संगठन अपने काडर को मिलिट्री ट्रेनिंग दे रहा है। तमिल दैनिक "दिनामणि" ने अप्रैल 2008 में इस सम्बन्ध में खबर दी थी कि जिसमें इस संगठन ने 15 अगस्त के मौके पर "फ़्रीडम परेड" का आयोजन किया, जिसमें इसके 1000 से अधिक सदस्यों ने बाकायदा शस्त्रों के साथ प्रदर्शन किया, लेकिन इसे भारत की आज़ादी के साथ जोड़कर एक छद्म आवरण में छिपा दिया गया। संगठन ने पिछले 4 साल में 25,000 नये सदस्यों की भरती की है। (देखें चित्र) MNP की गत वर्ष की वार्षिक रैली में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रण्ट के झण्डे से मिलता जुलता झण्डा लहराया गया और पोस्टर चिपकाये गये। इस कवायद में पापुलर फ़्रण्ट नामक संगठन भी शामिल है जो कि बात करता है भारत की एकता और अखण्डता की, लेकिन इनकी वार्षिक बैठक में निम्न प्रस्ताव पारित किये गये हैं -

1) बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण किया जायेगा।

2) एयरपोर्ट का नाम शहीद(?) टीपू सुल्तान के नाम पर रखा जाये।

3) सच्चर कमेटी की सिफ़रिशे तुरन्त लागू करवाने हेतु संघर्ष किया जायेगा।

4) बाबा बोधनगिरि पर्वत के भगवाकरण का विरोध किया जायेगा।

5) अफ़ज़ल गुरु को फ़ाँसी क्यों नहीं होना चाहिये, इस विषय पर व्यापक प्रचार किया जायेगा।

6) सभी प्रकार के पुलिस एनकाउंटरों की जाँच की माँग की जायेगी

7) नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ धरना-प्रदर्शन आयोजित किये जायेंगे… आदि-आदि

http://www.popularfrontindia.org/documents/Popular%20Front%20of%20India%20Annual%20Report%202007.html

इस प्रकार की "फ़्रीडम परेड" की इजाज़त तमिलनाडु और केरल सरकारों ने कुम्भकोणम, मदुराई, इदुक्की आदि जगहों पर दी। यहाँ तक कि येद्दियुरप्पा ने भी "थोड़ा सा सेकुलर हो जायें" की तर्ज़ पर इस संगठन को मंगलोर में रैली की इजाजत दी, लेकिन मैसूर में तनाव को देखते हुए इसे अनुमति नहीं दी।
http://www.deccanherald.com/content/20200/pfi-flays-government-stages-protest.html

एक तरफ़ तो ये संगठन देशभक्ति की बातें करते जाते हैं, और दूसरी तरफ़ वन्देमातरम का विरोध, बाबरी मस्जिद की बरसी मनाना, अफ़ज़ल गुरु के समर्थन में कैम्पेन चलाना जैसे काम भी करते जाते हैं। TMMK (तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कषगम) और TNTJ (तमिलनाडु तौहीद जमात) के पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध उजागर हो चुके हैं, और पाकिस्तान के अखबारों में इन्हें कवरेज मिलता रहता है।
http://www.app.com.pk/en_/index.php?option=com_content&task=view&id=61510&Itemid=2




ऐसा भी नहीं कि ये सिर्फ़ मानवता वगैरह का ही खेल खेलते हैं, मधु कौड़ा भी शरमा जायें ऐसे "2G स्पेक्ट्रम घोटाले" के तार इस पूरे "दयासागर" परिवार से ही लिपटे हुए हैं। (देखें चित्र) एक कम्पनी ETA समूह जिसे 2008 के अन्त में सिर्फ़ एक लाख के शेयर कैपिटल के साथ शुरु किया गया था, उसने एक साल के भीतर ही स्वान टेलीकॉम के 380 करोड़ के शेयर ले डाले, स्वान टेलीकॉम और 2G स्पेक्ट्रम घोटाले के बारे में काफ़ी कुछ पहले ही लिखा जा चुका है। ETA समूह के निदेशकों तथा करुणानिधि के बहुत "दोस्ताना सम्बन्ध" हैं, तथा ETA समूह को ही तमिलनाडु में नये सचिवालय के निर्माण सहित, बड़े-बड़े सड़क, बाँध के प्रोजेक्ट मिले हैं (बिलकुल राष्ट्रसन्त राजशेखर रेड्डी के परिवार की तरह)। अब भला मनमोहन सिंह जी की क्या बिसात कि वे दूरसंचार मंत्री राजा को निकाल बाहर करें, सो "रिक्वेस्ट" कर रहे हैं कि भाई साहब यदि मर्जी हो तो किसी दूसरे को दूरसंचार मंत्रालय दे दो, नहीं तो कोई बात नहीं… संसद में चार दिन हल्ला होगा, विपक्ष चिल्लायेगा, होना-जाना कुछ नहीं है (वैसे भी प्रधानमंत्री द्वारा अपनी पसन्द का मंत्रिमण्डल बनाने के दिन अब लद गये, अब मंत्रिमण्डल करुणानिधि, लालू, ममता, रेड्डी आदि लोग तय करते हैं)।

कुल मिलाकर कहा जाये, तो करुणानिधि की "दया" का पूरा का पूरा सागर तमिल उग्रवादियों के पक्ष में तो उमड़ा ही करता था, लेकिन वोट बैंक का बैलेंस अपने पक्ष में बनाये रखने के लिये इस्लामिक अलगाववादियों के पक्ष में भी जब-तब उमड़ता ही रहता है, खासकर अन्नादुरै की जयंती के दिन। जब सरकार खुद ही इन्हें प्रश्रय दे रही हो तो पुलिस से यह उम्मीद करना बेकार है कि वह खास शहरों के कुछ "खास मोहल्लों" में घुसने की हिम्मत भी कर सके। तमिलनाडु में कानून-व्यवस्था की हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है, और पिता-बेटा-भतीजा-भांजा आदि मिलकर राज्य पर बोझ बढ़ाते जा रहे हैं।

चुनाव के समय "साम्प्रदायिकता" का डर दिखाकर और सस्ता चावल, सस्ता टीवी जैसे मूर्ख बनाने के नारों से चुनाव जीत लिया जाता है, फ़िर 5 साल के लिये नमस्ते… और यह दुर्गति कमोबेश भारत के हर राज्य में है… इसलिये महारानी की जय बोलिये तथा भारत बदलने निकले दलित के घर सोने वाले "युवराज" को चुपचाप सत्ता सौंप दीजिये… क्योंकि "मीडियाई भाण्ड" तो उनका ऐसा गुणगान कर रहे हैं जैसे "राहुल बाबा" पता नहीं क्या-क्या उखाड़ लेंगे और क्या-क्या बदल डालेंगे। तात्पर्य यह कि करुणानिधि, राजशेखर रेड्डी, मधु कोड़ा जैसे लोग येन-केन-प्रकारेण आपकी छाती पर मूंग दलते रहेंगे… नेहरु से शुरु करके "कांग्रेसी संस्कृति" ने 60 साल में देश को यही सौगात दी है, आप देखते रहने और अफ़सोस करने के सिवा कुछ भी नहीं कर सकते… देश में "सेकुलर" और वामपंथी लॉबी बहुत मजबूत है जबकि "हिन्दू" बिखरा हुआ, सोया हुआ और कुछ हद तक मूर्ख और नपुंसक भी…।

उम्मीद तो कम है, फ़िर भी अपनी तरफ़ से जगाने का छोटा सा प्रयास तो कर ही सकता हूँ…


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Monday 23 November 2009

मोमबत्तियाँ खरीद लीं कि नहीं? “स्यापा सेलिब्रेशन महोत्सव” शुरु हो चुका है…

भाईयों-बहनों, मोमबत्तियों का स्टॉक बढ़ा लीजिये, किसी मोमबत्ती कम्पनी की शेयर हों तो रखे रहिये भाव बढ़ने वाले हैं, डिम्पल कपाड़िया के फ़ैन हों या न हों, उनकी दुकान से डिजाइनर मोमबत्तियाँ खरीद लीजिये… आपको तो पता ही होगा 26/11 की बरसी नज़दीक आ गई है…। कई प्रकार के “वार्षिक स्यापा महोत्सवों” में से एक यानी कि 26/11 की पहली बरसी आ रही है… चूंकि मामला नया-नया है इसलिये “इनफ़ इज़ इनफ़” कहकर डकार लेने वाली 5 सितारा पीढ़ी भी जोश में है और 26/11 सेलिब्रेट करने के लिये कटिबद्ध भी… क्योंकि उन्हें भी पता है कि पहला ही साल होने के कारण इस बार “सेलिब्रेशन” कुछ ज्यादा ही जोरदार रहेगा। इसी 5 सितारा पीढ़ी का खयाल रखते हुए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने मनु शर्मा को अपनी सिफ़ारिश से पेरोल दिलवाया था, ताकि देश की इस “अघाई हुई” पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में मनु 26/11 को सेलिब्रेट करें… अब इसमें शीला दीक्षित की क्या गलती, कि मनु शर्मा 26/11 आने से पहले ही बारों-पबों-रेस्टोरेण्टों में जाकर दारु में गर्क हो गया।

विभिन्न चैनलों पर मातमी धुनें बजने लगी हैं, पुराने ग्राफ़िक्स निकाल-निकालकर हमें याद करवाया जा रहा है कि, देखो ऐ निकम्मों हमने उस वक्त कितना काम किया था, लगातार 3 दिनों तक लाइव प्रसारण किया था तुम्हारे लिये, और तुम हो कि एक मोमबत्ती भी नहीं खरीद सकते? कुछ चैनलों पर उनकी स्थाई "रुदालियाँ" दिखाई देंगी, जो लोकतन्त्र पर हमले की दुहाई वगैरह देंगी। कोई 3 दिन का "ताज पैकेज" लाया है, तो कोई 5 दिन का "आतंकवाद रोको" पैकेज लाया है, ताकि आपका दिल लगा रहे और मनोरंजन होता रहे।

मेक-अप, ब्यूटी पार्लर वगैरह चाक-चौबन्द हैं, ताकि टीवी पर दुख सेलिब्रेट करते उच्च वर्ग का चेहरा-मोहरा अच्छा दिखाई दे। देश में एक प्रधानमंत्री भी हैं, जो इस मौके को नये अन्दाज़ में सेलिब्रेट करेंगे… जी हाँ, वे इस “फ़ड़तूस” से अवसर पर देश में रहकर क्या करते, सो बराक ओबामा के साथ जाम से जाम टकराकर सेलिब्रेट करेंगे, और ऐसा भी नहीं कि वे कुछ काम नहीं कर रहे, जाने से पहले कई बार चेता चुके हैं कि नया हमला होने वाला है, अब इससे ज्यादा और क्या करें वे बेचारे? जैसे कि शरद पवार भी हमें चेता चुके हैं कि मार्च तक कीमतें कम होने वाली नहीं हैं, जो उखाड़ना हो उखाड़ लो, मतलब ये कि सभी मंत्री बराबर काम कर रहे हैं। सरकारें भी ठीक काम कर रही हैं, क्योंकि करकरे का बुलेटप्रूफ़ जैकेट गायब हो चुका है, जबकि मुम्बई भेजे गये पुलिस के विशेष जवानों को नारकीय परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है।

मनमोहन सिंह लोकसभा में तो चुने नहीं गये हैं, जो कि संसद का शीतकालीन सत्र चलते रहने के बावजूद 26/11 के दिन यहाँ मौजूद रहें… उन्हें तो इटली की महारानी ने चुना है, भला महारानी को 26/11 से क्या लेना-देना और मनमोहन को लोकसभा से क्या मतलब? गन्ने के किसानों द्वारा हार की चोट दिये जाने के बाद मनमोहन को गम गलत करना भी जरूरी था, सो वे सेलिब्रेट करने अमेरिका जा पहुँचे हैं। इस सारे तमाशे को देखकर एक देशी शब्द याद आता है "चूतियापा", जी नहीं गाली नहीं है ये, बल्कि बिहारी शब्द "बुड़बक" का पर्यायवाची है… इसी चूतियापे को देखने के लिये कसाब और अफ़ज़ल गुरु को टीवी-अखबार दिया गया है ताकि उन्हें पता चले कि हम कितने "बुड़बक" हैं। अन्त में, मुझे उस व्यक्ति पर सबसे अधिक दया आती है, जो कहता है कि "भले ही कांग्रेस पैसा खाती हो, काम तो करती है…" यह संस्कार और मान्यता जिस देश की जनता में गहरे तक पड़ चुके हों, वह कभी आत्मसम्मान से नहीं जी सकता।

अब आप इस बारे में ज्यादा न सोचिये, मोमबत्तियाँ खरीदने निकल पड़िये… और मन में एक संकल्प लीजिये (ना ना ना ना आतंकवाद से लड़ने, भ्रष्टाचार खत्म करने आदि का संकल्प न लीजिये, उसके लिये तो सरकार कटिबद्ध, प्रतिबद्ध और भी न जाने क्या-क्या है), आप तो बस लगातार कांग्रेस को वोट देने का संकल्प लीजिये, राहुल बाबा की होने वाली "ताजपोशी" का इन्तज़ार कीजिये, भाजपा का अध्यक्ष कौन बनेगा इस चिन्ता में दुबले होईये, कमजोर विपक्ष की खुशियाँ मनाईये और मौज कीजिये। वैसे भी अपनी जिम्मेदारी सिर्फ़ वोट देने तक ही सीमित है, है ना?

Friday 20 November 2009

ओबामा को समर्पित एक प्रोडक्ट (यह पोस्ट सिर्फ़ पुरुष पाठक पढ़ें)…

अमेरिकी राष्ट्रपति का एक चौथाई कार्यकाल बीतने को है, अब तक वे कुछ खास काम नहीं कर पाये हैं। उनकी लोकप्रियता दिनोंदिन गिरती जा रही है -

1) वे इराक और अफ़गानिस्तान में फ़ेल हो गये…

2) पाकिस्तान को अरबों डालर की सहायता भी बहाल कर दी…

3) बराक "हुसैन" ओबामा ने चीन को खुश करने के लिये वहाँ भी दण्डवत कर दिया…

4) जापान के नरेश के सामने कोई अमेरिकी राष्ट्रपति कभी भी इतना नहीं झुका होगा कि उसके पिछवाड़े पर एक लात जमाने का लोभ न पैदा हो… (देखें चित्र)





5) इज़राइल के साथ भी उनके सम्बन्ध उतने सहज नहीं हैं जितने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों के होते थे…

6) पश्चिम एशिया के लिये अभी तक वे कुछ ठोस योजना लेकर नहीं आये हैं…

7) खुद अमेरिका में ही अर्थव्यवस्था में सुधार करने के लिये उनके प्रयास बेकार साबित हुए हैं…

ऐसे में भारत के मालवा प्रदेश (इन्दौर-उज्जैन) से एक ऐसा "धांसू प्रोडक्ट" आया है, जो उनके लिये मददगार साबित हो सकता है… हालांकि यह प्रोडक्ट भारतीय नेताओं के लिये अधिक उपयोगी है, क्योंकि 26/11 की बरसी नज़दीक है (कसाब एसी और अखबार के मजे लूट रहा है) तथा अफ़ज़ल गुरु भी चिकन उड़ा रहा है… ऐसे में यदि भारतीय नेता इस प्रोडक्ट का उपयोग करें तो अच्छा होगा… लेकिन चूंकि यह प्रोडक्ट ओबामा से जुड़ा हुआ है, इसलिये वे भी इसका उपयोग कर सकते हैं, शायद उन्हें कोई कामयाबी मिल ही जाये…

(इस प्रोडक्ट को देखने के बाद मालवा के लोगों की दूरदर्शिता के आप कायल हो जायेंगे, क्योंकि ओबामा के प्रेसिडेण्ट बनने से पहले ही यह प्रोडक्ट बाज़ार में आ गया था, यानी इसके निर्माताओं को पूरा भरोसा था कि बराक हुसैन ओबामा को इसकी जरूरत पड़ेगी)… मनमोहन सिंह जल्दी ही अमेरिका यात्रा पर जा रहे हैं, उनसे अनुरोध है कि इस प्रोडक्ट का एक सैम्पल साथ ले जायें… बराक ओबामा खुश हो जायेंगे और कभी भी भारत-विरोधी नीतियाँ नहीं अपनायेंगे…

अब सस्पेंस लम्बा खींचने की कोई तुक नहीं है… पेश है मालवा का धांसू प्रोडक्ट…



ढेण टणेण टारा डारा डारा डारा
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ढेण टणेण टारा डारा डारा डारा
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ढेण टणेण
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चलते-चलते एक और "शरारत" झेल ही जाईये…

नीचे दिया हुआ चित्र देखकर निम्न में से एक विकल्प का चुनाव कीजिये…
1) क्या यह कण्डोम का विज्ञापन है?
2) क्या यह गर्भनिरोधक गोली का विज्ञापन है?
3) क्या यह मुल्ला देशों की "शुद्ध अंग्रेजी" का विज्ञापन है?
4) Condemn को Condom लिखने पर "ऑक्सफ़ोर्ड" द्वारा AIDS के लिये कोई फ़ण्ड मिलता है?
 सही जवाब पर "ओबामा गोल्ड ऑइल" की एक शीशी इनाम में…




कहीं मेरे पाठक यह मुगालता न पाल लें कि मैं सिर्फ़ गम्भीर, हिन्दुत्व-राष्ट्रवाद वाले लम्बे-लम्बे लेख ही लिख सकता हूं, इसलिये यह एक "छवि-तोड़क" पोस्ट है… :)

लम्बे लेख लिखने के लिये सर्च करते समय नेट पर सर्च करते समय, ऐसा भी बहुत कुछ मिल जाता है… तो सोचा कि माहौल को हल्का-फ़ुल्का बनाने के लिये आपके साथ शेयर करता चलूं…) हालांकि यह एक राजनैतिक हास्य-व्यंग्य है, लेकिन यदि किसी को यह पोस्ट अश्लील लगा हो तो क्षमाप्रार्थी हूं…

(नोट - गम्भीर लेखन करते-करते, कभीकभार शरारत का मूड हो जाता है, अतः इस पोस्ट को सिर्फ़  एक मजाक के तौर पर लिया जाये…)