Monday, 30 April, 2007

सोहराब और "गंगाजल"

सोहराब के फ़र्जी एनकाऊँटर पर बडा बावेला मचा हुआ है और गुजरात पुलिस के कुछ अधिकारियों पर केस भी चालू हो गया है (हालाँकि सोहराब पर हल्ला ज्यादा इसलिये मचा है क्योंकि एक तो वह मुसलमान है और फ़िर गुजरात में मारा गया है, तो फ़िर क्या कहने... सेकुलरवादियों और मानवाधिकारवादियों के पास काम ही काम)... बहरहाल यह बहस का अलग विषय है... मेरा फ़ोकस है सोहराब पर हुई कार्रवाई । शायद कुछ लोग ना जानते हों, लेकिन उज्जैन के लोग जानते हैं कि सोहराब का सपना था मालवा का डॉन बनना, उसके घर के कुँए से एके ५६ और पिस्तौलें भी बरामद हुई थीं और पहले से उस पर कई आपराधिक मामले चल रहे थे, कुल मिलाकर सोहराब कोई संत-महात्मा या पीर-फ़कीर नहीं था, ना ही कोई आम सीधा-सादा इन्सान...कुछ समय पहले आई थी फ़िल्म गंगाजल । जैसा कि सब जानते हैं फ़िल्म की पृष्ठभूमि भागलपुर (बिहार) के आँखफ़ोडवा कांड पर आधारित थी, जिसमें पुलिस ने जेल में बन्द विचाराधीन कैदियों की आँखों में तेजाब डालकर उन्हें अन्धा कर दिया था और उसे "गंगाजल" नाम दिया था । बाद में उस घटना की जाँच भी हुई थी, लेकिन तत्कालीन सरकार को जनता के विरोध के कारण मामले को रफ़ा-दफ़ा करना पडा । जनता यह समझती थी कि उन अपराधियों के साथ पुलिस ने ठीक किया है । उनमें से अधिकतर आरोपी हत्या और बलात्कार के आरोपी थे । यह घटना वैसे तो साफ़-साफ़ कानून को अपने हाथ में लेने की थी, लेकिन जनता के खुले समर्थन के कारण स्थिति अजीब सी हो गई थी । एक और फ़िल्म है जिसका नाम है "अब तक छप्पन" । फ़िल्म मुम्बई पुलिस के इंस्पेक्टर दया नायक के जीवन पर आधारित थी, जिन्होंने अब तक छप्पन खूँखार अपराधियों को मौत के घाट उतार दिया है, उन्हें मुम्बई पुलिस एन्काउण्टर विशेषज्ञ मानती है (हालाँकि दया नायक फ़िलहाल कई आरोपों से घिरे हुए हैं, जिसके पीछे भी राजनैतिक या उनके आला अफ़सरों का हाथ हो सकता है).... ऐसे ही कुछ वर्षों पहले एक फ़िल्म आई थी "यशवन्त", जिसमें नाना पाटेकर ने ही पुलिस इंस्पेक्टर का रोल निभाया था, उस फ़िल्म के एक दृश्य में एक पत्रकार अपने अखबार में इंस्पेक्टर यशवन्त की कार्यशैली की कडी आलोचना करता है, कि यह इंस्पेक्टर अपराधियों के साथ बहुत मारपीट करता है, जानवरों की तरह से पेश आता है, इसे मानवाधिकारों का कोई खयाल नहीं है आदि-आदि । उसी पत्रकार का बैग एक बार चोरी हो जाता है, वह पत्रकार यशवन्त के थाने में रिपोर्ट लिखाने जाता है, यशवन्त उससे वारदात का इलाका पूछता है और बैठने को कहता है, फ़िर हवलदार को आदेश देता है कि फ़लाँ व्यक्ति को पकड़कर लाओ । एक गुण्डे को थाने में लाया जाता है, यशवन्त उससे बडे प्यार से पूछता है कि पत्रकार साहब का बैग तूने चुराया है, उन्हें वापस कर दे, जैसा कि उसे अपेक्षित होता है, गुण्डा मना करता है कि मैने कोई बैग नहीं चुराया है । फ़िर भी यशवन्त उस गुण्डे को ठंडा पिलाता है और बिरयानी भी खिलाता है और फ़िर एक बार प्यार से पूछता है, गुण्डा फ़िर इनकार करता है । फ़िर यशवन्त अपने पुलिसिया अन्दाज में गुण्डे को जोरदार तमाचे रसीद करता है, और गुण्डा तत्काल उस पत्रकार का बैग का पता बता देता है । यह तो हुई फ़िल्मों की बात, लेकिन सामान्य जनजीवन में भी हमारे सामने जे.एफ़.रिबेरो, केपीएस गिल और किरण बेदी जैसे साक्षात उदाहरण हैं, जिन्होने अपराधियों, आतंकवादियों और कानून तोडने वालों के खिलाफ़ जंग सफ़लतापूर्वक जीती है । उपरोक्त उदाहरण देने का मकसद सिर्फ़ यही सवाल उठाना है, कि अपराधियों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिये ? क्या मानवाधिकार सिर्फ़ गुण्डे-बदमाशों के लिये हैं, जान पर खेलने वाले और चौबीस घण्टे "ऑन ड्यूटी" रहने वाले पुलिस वालों के लिये नहीं ? अपराधियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाना चाहिये, परन्तु उसकी सीमा क्या हो, यह कौन तय करेगा, और कैसे ? इस बात की क्या गारण्टी है कि बिहार की उन जेलों में बन्द वे हत्यारे और बलात्कारी (जिनको सजा भी हो पाती या नहीं यह कहना मुश्किल है) मानवीय व्यवहार पाकर वे सुधर जाते ? क्या जेल से बाहर आकर वे पुनः वैसा ही घृणित अपराध नहीं करते ? ऐसे आदतन अपराधियों को यदि कतिपय पुलिसकर्मियों ने अन्धा करके भविष्य के लिये निष्क्रिय कर दिया, तो इससे समाज का भला हुआ या नहीं ? मुम्बई पुलिस के नायाब इंस्पेक्टर दया नायक को रोज नया रास्ता बदलकर ऑफ़िस जाना पडता है, वे अपने परिवार के साथ सहज रूप से समय नहीं बिता सकते, चौराहे पर खडे होकर चाट-पकौडी नहीं खा सकते, भरा हुआ रिवाल्वर हरदम (सोते समय भी) उनके पास होता है चाहे वे ड्यूटी पर हों या नहीं । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उनके कोई मानवाधिकार नहीं हैं ? क्या उन्हें आम जिन्दगी जीने का हक नहीं है ? या उनका यह कसूर है कि उन्होंने पुलिस की नौकरी करके कुछ गुण्डों को खत्म कर दिया ? जबकि तथाकथित "ए" क्लास कैदी (?) (मुझे तो यह अवधारणा भी हास्यास्पद लगती है... "ए" क्लास कैदी क्या होता है और क्यों होता है, पता नहीं) को घर से लाया खाना, टीवी, मोबाईल की सुविधा उपलब्ध है, यह भेदभाव क्यों ? अपराधी को पकडने वाले ईमानदार पुलिस अफ़सर पर सदा तलवार लटकती रहे और अपराधी जेल में चिकन उडाये ? जैसा कि "यशवन्त" फ़िल्म के उदाहरण से स्पष्ट है कि अपराधी को पुलिस से डरना चाहिये, यदि पुलिस अफ़सर को यकीन है और उसके पास पुख्ता जानकारी है कि फ़लाँ व्यक्ति अपराधी है, तो अपराधी से सच उगलवाने की पूरी छूट उसे मिलनी चाहिये, जबकि हकीकत में आज उलटा हो रहा है । पुलिसवाले डरने लगे हैं कि कहीं अपने ऊपर केस न बन जाये, विभागीय जाँच न प्रारम्भ हो जाये, कहीं लॉक-अप में मर गया तो जिन्दगी बीत जायेगी कोर्ट के चक्कर खाते-खाते, कोई रसूखदार गुण्डा (लगभग सभी रसूखदार ही होते हैं) प्रेस के सामने मानवाधिकार की गुहार ना लगाने लग जाये । इस सबसे बचने के बाद सबूत इकठ्ठा करना, लम्बी कागजी और अदालती कार्रवाईयों को झेलना और फ़िर उसके बाद उसी गुण्डे को बाइज्जत बरी होते देखना, फ़िर कुछ वर्षों बाद उसी गुण्डे को विधायक या मंत्री बने देखकर उसे सेल्यूट करना, किसी भी पुलिस वाले के लिये यह एक भयानक दुःस्वप्न के समान है, जिसे केवल और केवल भुक्तभोगी ही जान सकता है । ऐसे में दबाव अब पुलिस पर बनने लगा है और गुण्डे ऐश करते हैं । पुलिस का "जलवा" अब कम होने लगा है । पंजाब में जब आतंकवाद अपने चरम पर था, तब केपीएस गिल ने उसपर काबू पाया, परन्तु जैसे ही आतंकवाद खत्म हुआ मानवाधिकारवादी सक्रिय हुए, कई पुलिस वालों को प्रताडित किया गया, कई पर मुकदमे चलाये गये, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने रेल से कटकर आत्महत्या तक कर ली । कहा गया कि उन्होंने मासूम लोगों को पूछताछ के नाम पर यातनायें दीं, हत्यायें कीं आतंकवाद को रोकने के नाम पर कई युवाओं को गायब करवा दिया... लेकिन परिणाम किसी ने नहीं देखा... अपनी जान हथेली पर लेकर आतंकवाद को खत्म करने वाले पुलिस अधिकारियों को यह इनाम, ऐसा सलूक । माना कि उनसे भी गलतियाँ हुई होंगी हो सकता है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस गया हो... लेकिन ऐसा तो युद्धकाल में होता ही है, तत्कालीन पंजाब के हालात शांतिकाल के नहीं थे ऐसी स्थिति में उस पुलिस अधिकारी के खिलाफ़ सुनवाई करते वक्त यह बात ध्यान में रखना चाहिये । काँटे को निकालने के लिये सुई का इस्तेमाल करना ही पडता है, एक फ़ूल की पत्ती से काँटा नहीं निकाला जा सकता । तात्पर्य यह कि एक सीमा तक तो दया, नरमी, मानवता आदि ठीक है, लेकिन जब पानी सर से ऊपर हो जाये अथवा गुण्डे पुलिस पर भारी पडने लगें तब दया नायक वाला तरीका ही ठीक है । किसी मामले में यदि सन्देह है तब तो शुरुआत में नर्मी दिखाई जा सकती है, लेकिन किसी के पास से एके ४७, लाखों की नोटों की गड्डियाँ, दारू की बोतलों के क्रेट बरामद हो रहे हों तब तो उससे पुलिसिया अंदाज में ही "व्यवहार" होना चाहिये । उस व्यक्ति की मंशा तो साफ़ दिख रही है, उसके साथ रियायत बरतना तो मूर्खता ही है । ऐसे में आतंकवादियों को पहले तो मुश्किल से पकडना, भारी सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखकर उन्हें वर्षों तक जेल में रखना आदि कितने खर्चे का काम है । यदि कल्पना के लिये मान लिया जाये कि कंधार प्रकरण के वक्त भारत सरकार स्पष्ट कह देती कि यदि सभी यात्रियों को नहीं छोडा तो जिन आतंकवादियों को छोडने की माँग कर रहे हो सबसे पहले उन्हें ही चौराहे पर लाकर गोली से उडा देंगे... तो कैसा सन्देश जाता...और ये तो बाद की बात है, वर्षों पहले यदि रूबिया सईद के बदले में आतंकवादियों को मार दिया जाता भले ही रुबिया शहीद हो जातीं तो आज कश्मीर और भारत में आतंकवाद का इतिहास ही कुछ और ही होता, लेकिन हमारी लोकतंत्री (?) शासन व्यवस्था इतनी लुंजपुंज है कि चाहे जो आकर सरकारों को झुकने को कहता है और झुकने की बजाय सरकारें लेट जाती हैं । क्या कभी हम इतने कठोर बनेंगे कि गुण्डे बदमाश, बलात्कारी, आतंकवादी अपराध करने से पहले दस बार अपने अंजाम के बारे में सोचे । आज चारों तरफ़ अफ़जल को माफ़ी देने की बात की जा रही है, सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है कि उन सैन्य परिवारों पर क्या गुजरती होगी जो उस हमले में शहीद हुए । लेकिन राजनीति इतने नीचे गिर चुकी है कि उसके बारे में कुछ कहना ही बेकार है । लेकिन समस्या का हल तो ढूँढना ही होगा, और मेरे अनुसार आज का समय भी युद्ध काल ही है इसलिये अब "ऑपरेशन गंगाजल - भाग २" का वक्त आ गया है । यदि हरेक शहर में दो-चार ईमानदार पुलिस वाले भी मिल जायें, जो दया नायक वाले तरीके में विश्वास रखते हों, तो देखते- देखते असामाजिक तत्वों में खौफ़ फ़ैलते देर नहीं लगेगी । "ईमानदार पुलिस वाले" शब्द का उपयोग इसलिये किया, क्योंकि यह पूरी तरह से उन्हीं पर निर्भर होगा, कि वे किस गुण्डे-बदमाश को "निष्क्रिय" करना चाहते हैं, इसलिये यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी है कि पहले वे पूरी तरह से आश्वस्त हो जायें कि वाकई यह व्यक्ति समाज के लिये एक खतरा बन चुका है और आगे भी न तो आम जनता को और ना ही पुलिस को यह चैन से रहने देगा, उस व्यक्ति को किसी ऐसे तरीके से समाप्त किया जाये कि "साँप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे" । अब ये तो पुलिस वालों को बताने की जरूरत नहीं है कि ऐसे "सुरक्षित तरीके" क्या और कैसे होने चाहिये...."गंगाजल" या किसी ऐसे जहर का इंजेक्शन जिससे वे धीरे-धीरे २-४ महीनों में एडि़याँ रगड-रगड कर घर में ही मर जायें (यह काम आधुनिक "टॉक्सिकोलॉजी" के जरिये आसानी से हो सकता है) (उन्हें आसान मौत मिलना भी नहीं चाहिये), या फ़िर ऐसी कोई दवाई, जिससे उन्हें "पैरेलिसिस" हो जाये... या कुछ और । मतलब तो सिर्फ़ यही है कि पुलिस का काम है समाज की गंदगी की सफ़ाई करना, चाहे जैसे भी हो आम जनता का भला होना चाहिये बस.... हो सकता है कि ऐसे काम करते वक्त एकाध गलत केस भी हो जाये, लेकिन जैसा कि मैने पहले ही कहा है कि "पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद ही" ऐसा किया जाना उचित होगा । मानवाधिकारवादियों से घबराने की कोई जरूरत नहीं है, हमारे देश में तो जब अफ़जल को भी माफ़ करने की बात की जा रही है, हो सकता है कि कल अब्दुल करीम तेलगी, अबू सलेम और दाऊद को भी मानवीयता (?) के नाते आम माफ़ी देने की माँग उठने लगे.... हाँ... इस मामले में मैं पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष हूँ और चाहता हूँ कि तेलगी, सलेम, दाऊद के साथ-साथ बबलू श्रीवास्तव, छोटा राजन आदि को भी उसी तरीके से निपटाया जाये...ताकि सेकुलरवादियों (???) को शिकायत का मौका ना मिले....

Friday, 27 April, 2007

गुलजा़र : दिल ढूँढता है....

हिन्दी फ़िल्मों के गीतों और गीतकारों के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है और आगे भी लिखा जाता रहेगा । गुलजा़र एक ऐसे गीतकार हैं जिनके बारे में जितना भी लिखा जाये कम है । फ़िल्म "मौसम" में लिखा हुआ उनका गीत "दिल ढूँढता है फ़िर वही फ़ुर्सत के रात दिन..." जितनी बार भी सुना, हमेशा मुझे एक नई दुनिया में ले गया है... यह गीत सुनकर लगता है कि फ़ुर्सत के पलों को यदि किसी ने मजे और शिद्दत से जिया है तो वे गुलजा़र ही हैं.... क्या गजब के बोल हैं और उतनी ही गजब की मदनमोहन साहब की धुन....। जब यूनुस खान साहब का रेडियोवाणी ब्लोग पढा, तो सोचा कि इस गीत के बारे में कुछ ना कुछ लिखना चाहिये...इस गीत की एक और खासियत भूपेन्द्र जी की आवाज है... तलत महमूद के बाद मुझे सबसे अधिक मखमली आवाज यही लगती है, आश्चर्य होता है कि कोई इतने मुलायम स्वरों में कैसे गा सकता है.... कहने का मतलब यही है कि गुलजार साहब की उम्दा शायरी, मदनमोहन का कर्णप्रिय संगीत, भूपेन्द्र की वादियों में गूँजती सी आवाज, परदे पर संजीवकुमार की गरिमामय उपस्थिति, सब के सब मिलकर इस गीत को बेहतरीन से बेहतरीन बनाते हैं...इस गीत में अखरने वाली बात सिर्फ़ यही है कि गुलजार साहब ने बारिश के दौरान फ़ुर्सत के पलों को कैसे जिया जाये यह उनके शब्दों में बयान नहीं किया है....शुरुआत होती है जाडो़ के मौसम से -
जाडों की नर्म धूप और
आँगन में लेटकर....
आँखों पे खींच कर तेरे आँचल के साये को
औन्धे पडे़ रहें कभी करवट लिये हुए...
क्या खूब कही है... यह अनुभव कोई भी आम आदमी कभी भी कर सकता है, किसी भी रविवार या छुट्टी के दिन जब वाकई जाडों की नर्म धूप हो... इस मंजर का मजा कुछ और ही है... साथ में चाय और पकौडे हों तो बात ही क्या, लेकिन पकौडे बनाने के लिये गई माशूका का आँचल फ़िर आँखों पर कैसे मिलेगा, इसलिये पकौडे कैन्सल...
फ़िर गुलजार साहब आते हैं गर्मियों की रातों पर और इस अनुभव को तो कई लोग आजमा चुके हैं...
या गर्मियों की रात जो
पुरवाईयाँ चलें....
ठंडी सफ़ेद चादरों पर
जागें देर तक
तारों को देखते रहें छत पर पडे हुए...

इस अनुभव में मात्र एक कमी है कि साथ में एक ट्रांजिस्टर हो जिसमें विविध भारती का छायागीत कार्यक्रम आ रहा हो, तो इस अनुभव में चार या छः चाँद और लग जायें....गौर करने वाली बात यह भी है कि इसमें गुलजार साहब ने "पुरवैया" हवाओं की बात कही है... जो नाम से ही शीतलता का अहसास दिलाती हैं....
अगला अंतरा आम आदमी के लिये नहीं है...(क्योंकि बर्फ़ीली सर्दियों में पहाड पर छुट्टी मनाने जाना यह किसी आम आदमी के बस की बात नहीं है) यह बात फ़िल्म में संजीव कुमार के लिये कही गई है....
बर्फ़ीली सर्दियों में
किसी भी पहाड पर...
वादी में गूँजती हुई
खामोशियाँ सुनें...

आँखों में भीगे-भीगे से लम्हे लिये हुए..
गुलजार साहब ने बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड पर जाने की बात कही है न कि किसी कमरे मे कम्बल के नीचे दुबक कर बैठ जाने की...क्या नवोन्मेषी विचार है... बर्फ़ीली सर्दियों में पहाडों की हसीन लेकिन गुमसुम वादियाँ क्या रोमाँटिक होंगी यह कल्पना ही की जा सकती है... यही तो है गुलजार साहब का "Orthodox" लेखन और चिन्तन जिसके हम जैसे लाखों मुरीद हैं..."मोरा गोरा अंग लई ले" से "बीडी जलई ले"... तक एक से बढकर एक तोहफ़े उन्होंने हमे दिये हैं.... और हम उनके आभारी हैं...

कुछ मजेदार (३)

(१) एक बार कश्मीर पर वार्ता करने मुशर्रफ़ साहब दिल्ली तशरीफ़ लाते हैं....
वाजपेयी-मुशर्रफ़ वार्ता शुरू होती है... दस मिनट पश्चात ही मुशर्रफ़ साहब पसीना पोंछते हुए बाहर आते हैं... वाजपेयी जी भी बाहर आकर पत्रकारों के सामने घोषणा करते हैं... कि मुशर्रफ़ ने कश्मीर पर अपना दावा छोड दिया है... पत्रकार हैरान... जो समस्या पचास-साठ साल में हल नहीं हुई वह दस मिनट में कैसे हो गई... वाजपेयी जी ने कहा... भाईयों जमाना मार्केटिंग और स्कीमों का है... मैने मुशर्रफ़ जी से कह दिया कि कश्मीर चाहते हो तो साथ में बिहार भी स्कीम के तहत मुफ़्त में लेना होगा...

(२) स्वर्ग में सभी लोग अपनी माँगें रख रहे थे....
सद्दाम हुसैन ने कहा - मैं चाहता हूँ कि इराक युद्ध में मैं जीत जाऊँ...
भगवान बोले - तेरी पूरी जिन्दगी में यह सम्भव नहीं होगा.... सद्दाम रोते हुए चले गये
फ़िर मुशर्रफ़ पहुँचे और बोले - मैं चाहता हूँ कि पूरा कश्मीर पाकिस्तान में मिल जाये...
भगवान बोले - तेरी पूरी जिन्दगी में यह सम्भव नहीं है... मुशर्रफ़ रोते हुए चले गये...
फ़िर लालू जी का नम्बर आया - मैं चाहता हूँ कि बिहार पूर्ण साक्षर, खुशहाल, जातिवाद से मुक्त और औद्योगिक रूप से अग्रणी राज्य बन जाये....
अब भगवान रोने लगे और वहाँ से चले गये....

Thursday, 26 April, 2007

कुछ मजेदार (२)

कुछ परिभाषायें

तलाक : शादी का भविष्य काल
लेक्चर : भाषण की वह कला, जिसमें कोई भी जानकारी और बोले हुए शब्द सिरों के ऊपर से निकल कर दरवाजे से बाहर निकल जाते हैं ।
कॉन्फ़्रेंस : एक व्यक्ति का "कन्फ़्यूजन" कई व्यक्तियों में बाँटना ।
कॉन्फ़्रेंस रूम : एक ऐसा कमरा, जिसमें सभी बोलते हैं, कोई ध्यान से नहीं सुनता और अन्त में सभी असहमत हो जाते हैं ।
समझौता : रोटी के ऐसे हिस्से करना, जिसमें सभी को लगे कि उसे ज्यादा मिला है ।
शब्दकोष : एकमात्र ऐसी जगह जहाँ (त) तलाक पहले आता है (श) शादी बाद में ।
मुस्कान : एक ऐसी वक्र रेखा जो अच्छे-अच्छों को सीधा कर देती है ।
ऑफ़िस : घर से दूर सुकून भरी जगह ।
जम्हाई : वह समय, जब शादीशुदा व्यक्ति अपना मुँह खोलता है ।
इत्यादि : ऐसा शब्द जिससे लगे आप बहुत कुछ जानते हैं ।
समिति : व्यक्तियों का ऐसा झुंड, जो अकेले में कुछ नहीं कर पाते और फ़िर हमें बताते हैं कि हम समूह के रूप में भी कुछ नहीं कर सकते ।
अनुभव : अपनी असंख्य गलतियों को दिया गया एक नाम
परमाणु बम : एक ऐसा आविष्कार, जो सारे आविष्कारों को समाप्त कर सकता है ।
कूटनीतिज्ञ : ऐसा व्यक्ति जो आपको मीठी सी भाषा में समझाये कि "भाड़ में जाओ" और आप वहाँ जाने को उतावले हो उठें ।
राजनीतिज्ञ : जो चुनाव से समय हाथ हिलाता है, फ़िर बाद में विश्वास ।
अवसरवादी : वह आदमी, जो नदी में पैर फ़िसल कर गिरने पर वहीं नहाने लगे ।
अपराधी : हमसे कोई अलग व्यक्ति नहीं, अन्तर सिर्फ़ यही है कि वह पकडा गया है ।
बॉस : जब आप देर से पहुँचे तो जल्दी आ जाये और जब आप जल्दी पहुँचे तो वह छुट्टी पर हो ।
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प्रश्न : ग्लोबलाईजेशन (वैश्वीकरण) की चरम सीमा क्या है ?
उत्तर : राजकुमारी डायना की मौत,
बताओ कैसे ?
एक अंग्रेज राजकुमारी, मिस्त्र के बॉयफ़्रेंड के साथ, जर्मनी की कार में सवार, जिसमें हॉलैण्ड का ईंजन लगा हो, फ़्रांस की सुरंग में टकराई, जिसे बेल्जियम का ड्राईवर चला रहा था, और उसने स्विस व्हिस्की पी रखी थी, कार के पीछे इटली के पपाराजी लगे थे, और राजकुमारी का इलाज अमेरिकन डॉक्टर ने किया..... क्या खूब ग्लोबलाईजेशन है ।
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मीडिया सकारात्मक कब बनेगा ?

गत वर्ष एक समाचार पढा था कि हमारे राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम ने हर वर्ष आयोजित होने वाली इफ़्तार पार्टी को रद्द कर दिया है, एवं उस पार्टी के खर्च को एक अनाथालय को दान करने की घोषणा की है, लगभग उन्हीं दिनों में रामविलास पासवान द्वारा आयोजित इफ़्तार पार्टी में उन्हें लालू प्रसाद यादव को जलेबी खिलाते हुए एवं दाँत निपोरते हुए चित्र समाचार पत्रों मे नजर आये थे । उक्त दोनों समाचारों पर मीडिया की भूमिका ने जरूर कई सवाल खडे किये । भारतपुत्र अब्दुल कलाम के सकारात्मक और उत्कृष्ट कदम को लगभग सभी अखबारों में नगण्य सा स्थान मिला (समाचार पत्र के कोने में या पिछले पृष्ट पर), जबकि ऐसे लोग जिनका "इफ़्तार" और "रोजे" से कोई लेना-देना नहीं है, उनके समाचार एवं चित्र इलेक्ट्रानिक एवं प्रिण्ट मीडिया की सुर्खियाँ बने रहे । ऐसा क्यों ? इन घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग की नकारात्मक भूमिका को लेकर बुद्धिजीवियों एवं सामाजिक संगठनों को सवाल उठाने चाहिये । एक अच्छे और महान कार्य अथवा पहल को उतना "कवरेज" क्यों नहीं मिलता, जबकि गुण्डे-बदमाशों एवं घटिया नेताओं को लगभग पूरे पेज का कवरेज मिलता है । जरा कल्पना करें कि राष्ट्रपति के इस कदम को यदि समाचार पत्रों में "हेडलाईन" के रूप में छापा जाता, तो उस समाचार का कितना और कैसा "असर" होता, न सिर्फ़ मुस्लिमों में, बल्कि पूरे देश में । राष्ट्रपति के इस क्रांतिकारी कदम को व्यापक प्रचार मिलना चाहिये था, जो कि नहीं मिला, उलटे इस बात पर खामख्वाह की चर्चा की गई और समय बर्बाद किया गया कि, इस नेता की इफ़्तार पार्टी में कौन-कौन आया, कौन नहीं आया, उस नेता की इफ़्तार पार्टी में किसे नहीं बुलाया गया था, किसने क्या खाया, किसने-किससे कितनी देर तक बात की आदि-आदि बकवास । जबकि दूसरी ओर सच तो यही है कि आज भी औसत रूप से मुस्लिम समाज बेहद गरीब और अशिक्षित है, क्या उसे वाकई कोई फ़र्क पडता है कि किस नेता ने इफ़्तार पार्टी दी या नहीं दी ? रोजा रखना और इफ़्तार करना एक धार्मिक क्रिया है, उस माहौल में यदि अब्दुल कलाम के सकारात्मक कदम को मुख्य पृष्ठ पर जगह मिलती तो उसका भरपूर असर होता । यह तो मात्र एक उदाहरण है, आज तो हमें मीडिया परिदृश्य में इस प्रकार की प्रवृत्ति सहज ही देखने को मिल जाती है । किसी भी नकारात्मक समाचार को बढा-चढा कर पेश करना, फ़िर उस समाचार को लगातार "फ़ॉलोअप" करना (तभी तक कि जब तक कोई नया "चटपटा" समाचार ना मिल जाये), फ़िर उसे भूल जाना और किसी नई तथाकथित "एक्सक्लूसिव" की तलाश में लग जाना, यह आजकल के पत्रकारों (?) का शगल बन गया है । क्या हम तेजी से ब्रिटेन की "टेब्लॉयड" संस्कृति की ओर बढ रहे हैं, जहाँ प्रसिद्ध लोगों (?) (अच्छे और आदर्श लोगों नहीं) के व्यक्तिगत सम्बन्धों, शादी, तलाक, बलात्कार आदि के बारे में छ्पाई होती रहती है । "शिवानी हत्याकांड", "मधुमिता हत्याकांड", "जेसिका लाल हत्याकांड" और सबसे बढ कर ऐश-अभिषेक की शादी का जैसा और जितना कवरेज हुआ उतना तो भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा को भी नहीं मिला । परन्तु क्या इन समाचारों के सामाजिक प्रभाव के बारे में भी मीडिया को नहीं सोचना चाहिये ? इन समाचारों को लगातार देखने-सुनने-पढने से हमारी युवा पीढी और बच्चों पर क्या असर हो रहा है, इसकी जिम्मेदारी किसकी है ? जबकि मीडिया यदि अपनी "असली शक्ति" का उपयोग करे तो वह क्या नहीं कर सकता । यहाँ पर उल्लेखनीय है कि शीतयुद्ध के जमाने में रूस और अमेरिका के अखबार अपने-अपने देशों को आगे बताने के लिये प्रचार-दुष्प्रचार का सहारा लिया करते थे, दोनो ही देशों के समाचार पत्रों एवं मीडिया में देशभक्ति की होड लगी रहती थी, उद्देश्य था देशवासियों का मनोबल बढाना एवं बनाये रखना । एक घटना का उल्लेख करना आवश्यक है - किसी तीसरे देश में हुई एक दौड प्रतियोगिता में अमरीकी धावक पहले स्थान पर एवं रूसी धावक मात्र कुछ सेकण्डों से दूसरे स्थान पर रहा । अब एक ही समाचार को किस तरह छापा गया - अमरीकी अखबार ने लिखा "हमारे महान धावक ने रूसियों के गर्व को चूर-चूर करते हुए भारी अन्तर से दौड जीती", वही रूसी अखबार ने लिखा - "रूस की महान खेल परम्परा को आगे बढाते हुए हमारे धावक ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए प्रतियोगिता में दूसरा स्थान प्राप्त किया" (इस समाचार में प्रथम आये अमरीकी का कोई उल्लेख नही था) । तात्पर्य यह कि मीडिया की सुर्खियाँ हमेशा सकारात्मक समाचारों से परिपूर्ण होना चाहिये, न कि भ्रष्टाचार, अनैतिकता, हिंसा, दंगो से । जरा पाठकगण याद करें कि उन्होंने कितनी बार अण्णा हजारे, अब्दुल कलाम (राष्ट्रपति बनने से पहले), डॉ. पद्मनाभन, बचेन्द्री पाल, धनराज पिल्लै, राजेन्द्र सिंह (पानी वाले बाबा के नाम से मशहूर), नारायण मूर्ति, किरण बेदी आदि जैसी हस्तियों को कितनी बार मुखपृष्ठ पर बडे-बडे अक्षरों के साथ देखा है ? नहीं देखा, क्योंकि अच्छे-अच्छे कारनामों को हमारा मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनो) अन्दर के पृष्ठों पर जगह देता है, वह भी कंजूसी से । जबकि घोटालों, स्कैण्डलों, बम विस्फ़ोटों, दंगों, दो कौडी के सलेम टाईप के गुण्डों को हमेशा मुखपृष्ठ पर जगह मिलती है । हाल ही मेरे एक मित्र ने जो कि इसराइल से लौटकर आया, वहाँ के समाचार पत्रों के बारे में बताया कि वहाँ लगभग सभी अखबार या चैनल कोई ना कोई सकारात्मक समाचार छापते-दिखाते रहते हैं, जिससे जनता में एक धनात्मक सन्देश जाता है । इसराईल में बस में हुए एक विस्फ़ोट के समय यह समाचार दूसरे पृष्ठ पर था, जबकि उसी दिन एक किसान ने अपने खेत में नई तकनीक का इस्तेमाल कर सिंचाई की नई पद्धति विकसित की, यह समाचार मुख्यपृष्ठ पर था, तस्वीर सहित । जबकि बम विस्फ़ोट की दूसरे पृष्ठ पर भी कोई तस्वीर नहीं छापी गई । ठीक यही अमेरिका में ग्यारह सितम्बर के हमले के बाद हुआ, लाशों की, बिलखते लोगों, रोती महिलाओं की या अस्पतालों में घायलों की तस्वीरें वहाँ मीडिया ने स्वेच्छा से नहीं दिखाई, जबकि आग बुझाने वाले और घायलों का बचाव करने वाले दमकलकर्मियों और युवाओं को जब पुरस्कार बाँटे गये, तो सभी समाचार पत्रों ने उसे मुख्यपृष्ठ पर स्थान दिया, यही तो है सकारात्मक पत्रकारिता । इससे आम जनता, जो अपनी परेशानियों में पहले से ही त्रस्त है, का मनोबल बढता है, अच्छे और ऊर्जावान लोगों के समाचार पढने से मन में भी उसी प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं । भारत से तुलना करें तो हमारा मीडिया, मुशर्रफ़ की "बॉडी लैंग्वेज" पढने में ही उलझा रहता है, और वे सबको गरिया कर चले गये.... ऐश-अभिषेक की शादी में कुत्ते की तरह गेट के बाहर खडे रहे, डंडे खाये फ़िर भी शर्म नहीं आई... मीडिया का एक ही काम रह गया है, पहले विवाद पैदा करना, फ़िर उसे खूब सेंकना / चबाना, आपस में भिडाना, फ़िर नया शिगूफ़ा छोडकर नई खबर में लग जाना, पुराने घोटाले का क्या हुआ इस बारे में सोचना उसका काम नहीं (तेलगी, निठारी... आदि) । असली दिक्कत यह है कि कुछ बडे समाचार घराने अपने-आप को "किंगमेकर" समझने लगे हैं, और साबुन बेचना और अखबार चलाने को एक जैसा ही काम मानते हैं । सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, चैनलों, पत्रकरों, "मीडिया-मुगलों" को इस दिशा में विचार करना चाहिये, कि क्या देश में किसी नई प्रेस आचार संहिता की आवश्यकता है ? या बाजारवाद की अंधी दौड में मीडिया भी शामिल रहेगा, जिसका मुख्य काम है जनजागरण और समाज को नई दिशा देना, न कि समाचार "बेचना" (!) । ऊपर जिन हस्तियों के नाम लिखे हैं उनमें से कई के नाम तो आज के युवाओं ने सुना भी नहीं होगा, उनके काम के बारे में जानना तो बहुत बडी बात है, लेकिन उसी युवा को यह जरूर पता होगा कि शाहरुख खान का पीठ दर्द अब कैसा है, या सलमान खान कब और किससे शादी करेगा, या नहीं भी करेगा । अब यदि हमारे बच्चे छोटा राजन, अबू सलेम और वीरप्पन को ज्यादा जानते-पहचानते है बजाय वर्गीज कुरियन के तो इसमें किसका दोष है ?

Wednesday, 25 April, 2007

कुछ मजेदार...

नेटजाल पर चल रही ऊलजलूल की बहसों, थुक्का-फ़जीहत, जूतम-पैजार, तूतू-मैमै से दूर असली आनन्द है हास्य में....तो मजा लो....
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(१) एक बार एक सरकारी कर्मचारी बरसों से धूल खा रही फ़ाईलों की आलमारी को साफ़ कर रहा था, तभी अचानक उसके हाथ एक चिराग लगा, जो कि अलादीन का चिराग था । उत्सुकतावश उसने उसे घिसा तो उसमें से जिन्न प्रकट हुआ और बोला कि तीन वर माँगो, पूरे किये जायेंगे...सरकारी कर्मचारी खुश हो गया... उसने बोला सबसे पहला - व्हाईट हाऊस मेरा हो जाये....ज्ज्ज्जूम वह व्हाईट हाऊस पहुँच गया... फ़िर उसने कहा - अब नौकरों-चाकरों की फ़ौज और बढिया सा हवाई जहाज.... वह भी प्रकट हो गया... फ़िर उसने कहा कि अब कुछ ऐसी व्यवस्था करो कि मुझे जिन्दगी भर कोई काम ना करना पडे....ज्ज्ज्ज्ज्जूम..... वह पलक झपकते ही अपने उसी सरकारी ऑफ़िस में उसी कुर्सी पर पहुँच गया...
सबक - मुँह खोलने से पहले दस बार सोचो
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(२) ऐसा ही एक अलादीन का चिराग एक बार किसी कारपोरेट ऑफ़िस में तीन लोगों को एक साथ मिला...जिसमें से दो सेल्समैन थे और एक उनका मैनेजर.... घिसने पर जिन्न प्रकट हुआ और बोला कि तुम तीन लोग हो इसलिये एक-एक वरदान माँग लो.... पहले मैं... पहले मैं... करते हुए दोनो सेल्समैन जोर-जोर से बोल पडे... पहले ने कहा - मुझे स्विटजरलैण्ड की हसीन वादियाँ और ढेर सारी वोदका चाहिये... तत्काल वह गायब होकर स्विटजरलैण्ड पहुंच गया.... दूसरा सेल्समैन कहाँ पीछे रहने वाला था... जल्दी-जल्दी में वह भी बोला....मुझे भी एक शांत निर्जन द्वीप और दो-चार सुन्दरियों का साथ चाहिये... वह भी गायब हो गया... फ़िर मैनेजर का नम्बर आया.... वह बोला - मैं चाहता हूँ कि वे दोनों बेवकूफ़ वापस अपने काम पर आ जायें....
सबक - जैसे घोडे के पीछे नहीं चलना चाहिये वैसे ही बॉस के आगे भी नहीं.....
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शासन व्यवस्था :
एक बार एक बच्चे ने अपने पिता से पूछा कि पापा - शासन व्यवस्था किसे कहते हैं ? और यह कैसे चलती है ? पिता ने सोचा कि बच्चे को अच्छी तरह से उदाहरण देकर समझायें तो ज्यादा सही समझेगा... पिता बोले....देखो मैं कमा कर लाता हूँ तो मैं हुआ "उद्योगपति" या "व्यापारी", तुम्हारी माँ उस पैसे को कैसे खर्चा करना है यह देखती है इसलिये वह "सरकार" है... हमारे घर का नौकर रामू "श्रमिक या कामगार" है...तुम्हारा दो माह का भाई "देश की अगली पीढी" है और तुम "आम नागरिक" हो...आया समझ में... बालक को कुछ खास समझ में नहीं आया । उसी रात बालक की नींद खुली तो उसने पाया कि उसका भाई दूध के लिये रो रहा है, वह माँ के कमरे में गया तो वह सो रही थी, फ़िर उसने पिता को ढूँढा तो पाया कि वे ठीक से पैर नहीं दबाने के लिये रामू को पीट रहे हैं, वह चुपचाप अपने कमरे में आय और अपने भाई को दूध पिलाकर सो गया.... अगली सुबह पिता ने पूछा - अब तुम बताओ शासन व्यवस्था कैसे चलती है ? बालक बोला - अब मैं समझ गया....जब "सरकार" सो रही होती है, "उद्योगपति" बुरी तरह से "श्रमिक" का शोषण करता है, जबकि "देश की अगली पीढी" अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिये भी तरसती है और सबसे ज्यादा भुगतना पडता है "आम नागरिक" को.....

कैसी रही... और कुछ अगले अंकों में....

अपना गणित सुधार लें

लोग कहते हैं कि गणित बहुत ही कठिन विषय होता है... सही भी होगा (मेरा तो है), जैसे कि जीवन का गणित भी उतना आसान नहीं होता, ना ही रिश्तों का, लेकिन जब हम आसपास नजर दौडाते हैं तो पाते हैं कि गणित कितना आसान है, लीजिये नमूना हाजिर है -
(१) रोनाधोना (x) बदले की आग (x) बेवफ़ाई (x) करोडों का झगडा = एकता कपूर सीरियल
(२) स्विटजरलैण्ड + लन्दन + न्यूजीलैण्ड + कनाडा में चार दिन = हिन्दी फ़िल्म का एक गाना
(३) एक सगाई + दो शादी गीत + बडी हवेली + चार सौ रिश्तेदार = सूरज बडजात्या
(४) एक व्यक्ति (-) शर्ट = सलमान खान
(५) सुष्मिता सेन (-) १.२ फ़ुट = आमिर खान
(६) सुषमा + जयललिता (-) ममता (x) मायावती = वाजपेयी का सिरदर्द
(७) पच्चीस दल + अस्सी मन्त्री + क्षेत्रीयतावाद (x) माँगें = वाजपेयी के घुटनों का दर्द
(८) भ्रष्टाचार + गुंडागर्दी + अनैतिकता + अपराध (-) इन्सानियत = नेता
(९) दसवीं + बारहवीं + बी.एससी. + एमबीए = बेरोजगारी
(१०) लालफ़ीताशाही + शिक्षा का मजाक + आरक्षण + भाई-भतीजावाद = विदेश जाता भारतीय युवा
(११) चीन का एक जिमनास्ट = ओलम्पिक के उदय से अब तक भारत के कुल पदक
(१२) कार्ल लुईस = सन 3000 तक एथलेटिक्स में भारत के कुल ओलम्पिक पदक
(१३) एक सचिन तेंडुलकर = ४ इयान चैपल + १२ माइकल एथरटन + .....................
ऐसे और भी आसान से दिखने वाले गणित हमारे चारों तरफ़ बिखरे पडे हैं, जरा नजर तो दौडाईये... खुद भी मजा लीजिये और मुझे भी बताईये...

Monday, 23 April, 2007

उत्तर-दक्षिण के बीच बढती खाई

विश्व बैंक की ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया गया है कि केरल और उत्तरप्रदेश के मानव विकास सूचकांक में काफ़ी बडा़ अन्तर आ गया है । शिक्षा, स्वास्थ्य, जनभागीदारी के कार्यक्रम, शिशु मृत्यु दर, बालिका साक्षरता, महिला जागरूकता आदि कई बिन्दुओं पर विश्व बैंक ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि सामाजिक विकास की दृष्टि से केरल भारत के अग्रणी राज्यों में से एक है, और उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश (जिसकी स्थिति बाकी तीनों से कुछ बेहतर बताई गई है) ये चारों राज्य अब तक "बीमारू" राज्यों की श्रेणी से बाहर नहीं निकल सके हैं, और ना ही निकट भविष्य में इसकी कोई सम्भावना है ।
कुछ वर्षों पूर्व जब संसद में सीटों की संख्या बढाये जाने का प्रस्ताव विचाराधीन था, तब दक्षिण के राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने राजनैतिक पूर्वाग्रहों और मतभेदों से ऊपर उठकर इस बात का विरोध किया था कि संसद में सीटों की संख्या को जनसंख्या के अनुपात में बढाया जाये । उनका तर्क था कि इस तरह तो पुनः उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को इसका फ़ायदा मिल जायेगा, क्योंकि जनसंख्या तो वहीं की सबसे ज्यादा बढ रही है, जबकि दक्षिण के राज्यों को एक तरह से इसकी "सजा" मिलेगी, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियन्त्रण को प्रभावी तरीके से सफ़ल बनाया है । दक्षिणी राज्यों का विरोध बिलकुल सही था, क्योंकि अभी भी दक्षिण के राज्यों को संसद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है, जबकि उत्तरप्रदेश (उत्तराखण्ड मिलाकर) ८५ एवं बिहार (झारखण्ड मिलाकर) ५४ सांसद संख्या के मामले में संसद में अपनी उपस्थिति से सारे गणित को उलटफ़ेर करने में सक्षम हैं । भारत के अधिकतर प्रधानमन्त्री उत्तरप्रदेश से आते हैं, क्योंकि लोकतन्त्र संख्या बल से चलता है (यहाँ सिर गिने जाते हैं, सिरों के भीतर क्या है यह नहीं देखा जाता), परन्तु यह संख्या बल के साथ-साथ उस जनता का भी अपमान है, जिसने स्वतः होकर जनसंख्या नियन्त्रण में महती भूमिका निभाई है, यह उनके साथ अन्याय होता कि मात्र जनसंख्या के आधार पर उत्तरप्रदेश और बिहार संसद में सभी पर हावी हो जाते हैं (लगभग यही स्थिति हिन्दी और उसके आग्रह को लेकर है और जिस पर क्षेत्रीय राज्यों को गहरी आपत्ति है, लेकिन यह बहस का अलग विषय है)... बहरहाल आर्थिक दृष्टि से अपने को समृद्ध करने के लिये चारों दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कुछ समय पहले एक बैठक हुई थी, जिसमें इन चारों राज्यों ने अपने राजनैतिक विचारधाराओं और पार्टियों की सीमा से ऊपर उठकर आपस में समझदारी बनाई कि चारों राज्यों को आपस में मिलकर व्यापार, परिवहन, कर प्रणाली आदि में तालमेल बनाकर उसे सरल एवं सभी के लिये फ़ायदेमन्द बनाने की को