Friday, 29 June, 2007

शिवजी बिहाने चले.....एक विलक्षण गीत

शिवजी की नगरी उज्जैन में श्रावण के सोमवारों को भगवान महाकालेश्वर की सवारी निकलती है और अन्तिम सोमवार को बाबा महाकाल की विशाल और भव्य सवारी निकाली जाती है । ऐसी मान्यता है कि महाकाल बाबा श्रावण में अपने भक्तों और प्रजा का हालचाल जानने के नगर-भ्रमण करते हैं । उस शाही अन्तिम सवारी में विशाल जनसमुदाय उपस्थित होता है और दर्शनों का लाभ लेता है । शाही सवारी में सरकारी तौर पर और निजी तौर पर हजारों लोग अपने-अपने तरीके से सहयोग करते हैं । बैंड, होमगार्ड, स्काऊट-गाईड, विभिन्न सेवा संगठन, एवं कुछ विशिष्ट भक्तजन भी उस सवारी में शामिल होते हैं । सवारी में शामिल लोग विभिन्न रूप धरे होते हैं जैसे भूत, चुडैल, नन्दी, शेर आदि और ऐसा माहौल तैयार हो जाता है कि बस देखते ही बनता है, शब्दों में बयान करना मुश्किल है । उस वक्त हमेशा मुझे एक गीत याद आता है...गीत है फ़िल्म "मुनीमजी" का, लिखा है शैलेन्द्र ने, संगीत दिया है एस.डी.बर्मन ने और गाया है हेमन्त कुमार और कोरस ने । यह एक विलक्षण गीत है जिसे धरोहर गीत की संज्ञा भी दी जा सकती है । यह गीत हिन्दी से मिलती-जुलती भाषा में है, शायद यह अवधी, भोजपुरी या मैथिली में है ? शिव जी की बारात और विवाह प्रसंग का आँखों देखा हाल सुनाता है यह गीत । इस गीत में शैलेन्द्र ने जिस खूबसूरती से शिवजी के विवाह का वर्णन किया है वह अदभुत है । गीत की भाषा और कुछ शब्द तो ठीक से समझ में नहीं आते, लेकिन इतने लम्बे गीत लिखना, उसकी धुन बनाना और फ़िर उसे हेमन्त दा द्वारा त्वरित गति में गाना एक अतिउल्लेखनीय कार्य है, यह कल्पना ही की जा सकती है कि पुराने गीतों में ये महान लोग कितनी मेहनत करते होंगे, जबकि तकनीक इतनी उन्नत भी नहीं थी... बहरहाल, इस गीत को कई बार सुनने के बावजूद मैं इसके कुछेक शब्दों को नहीं पकड़ पाया (हो सकता है कि मेरा हेडफ़ोन उच्च क्वालिटी का नहीं है इसलिये..) गीत के बोलों को लिखते समय मैने कुछ जगहों पर ***** का प्रयोग किया है, अब लोग इसे सुनें और मेरी मदद करें ताकि इस गीत के पूरे बोलों को सामने लाया जा सके, साथ ही जब बोल सही रूप में सामने आयेंगे तभी हम गीत का सही मतलब भी समझ पायेंगे । वैसे मैने अपने तईं भरपूर कोशिश की है सही बोल लिखने की, फ़िर भी जब अन्तरा समाप्त होने को होता है उस वक्त जल्दी-जल्दी में गाये गये बोल पकड़ में नहीं आते । इसी प्रकार मैने कोशिश की है कि प्रत्येक अन्तरे के बाद उसका अर्थ समझाने का प्रयास करूँ, हो सकता है कि किसी अन्य को वह अर्थ सही ना लगे, तो वह कृपया उसका सही अर्थ मालूम करके मुझे बताने का कष्ट करें, ताकि भविष्य में इस गीत को पूरे अर्थ और सही बोलों के साथ प्रस्तुत किया जा सके... प्रस्तावना बहुत हुई अब पहले आप यह गीत सुनिये (यहाँ क्लिक करके) - फ़िर आते हैं इसके विश्लेषण पर...

गीत शुरु होता है हेमन्त दा के बोले हुए शब्दों से -

बम-बम भोला... बम-बम भोला..
बम-बम भोला... बम-बम भोला..

डमरू, ढोल, ताशे, शंख और नगाडे़ की आवाज के साथ गीत शुरु होता है -

हो..शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाय के
भभूति लगाय के, नाथ...
ओ शिवजी बिहाने चले पालकी सजाय के
कोरस - भभूति लगाय के, पालकी सजाय के, नाथ...
हो.. जब शिव बाबा करे तैय्यारी
कईके सकल समान हो..
दईने अंग त्रिशूल विराजे
नाचे भूत शैतान हो..
ब्रह्मा चले विष्णु चले
लईके वेद पुरान हो..
शंख, चक्र और गदा धनुष लै
चले श्री भगवान हो...
और बन-ठन के चलें बम भोला
लिये भांग-धतूर का गोला
बोले ये हरदम
चले लाड़का पराय के..
कोरस - हो भभूति लगाय के
पालकी सजाय के... ला..ला..
हो शिवजी बिहाने चले....

(मेरे मतानुसार यह अन्तरा विवाह से पहले दूल्हे की तैयारी के बारे में है, जिसमें भोलेनाथ को दाँये हाथ में त्रिशूल और भांग-धतूरे के साथ एवं साथी के रूप में ब्रह्मा और विष्णु को भी बताया गया है, सारे भूत-शैतान बारात में नाच भी रहे हैं)

कोरस - ओई आई, ओई आया..(२ बार)
फ़िर शहनाई की मधुर आवाज...

ओ माता मतदिन पर चंचललि
तिलक जलि लिल्हार हो
काला नाग गर्दन के नीचे
वोहू दियन फ़ुफ़कार हो..
नाग के फ़ुफ़कारने की आवाज आती है...
लोटा फ़ेंक के भाग चलैलि
ताविज निकल लिलार हो..
इनके संगे बिबाह ना करबो
गौरी रही कुंवारी हो
कहें पारवती समझाईं
बतियाँ मानो हमरो माईं
जै भराइलै हाँ हम करमवा लिखाय के
कोरस - भभूति लगाय के
पालकी सजाय के... हाँ...
हो शिवजी बिहाने चले....
(मेरे मतानुसार जब विवाह के पहले दूल्हे का द्वारचार किया जाता है, यह उस वक्त का दृश्य है जिसमें शिवजी की गर्दन का नाग फ़ुफ़कारता है तो आरती उतारने वाली, लोटा फ़ेंक के भाग खडी होती है, उस समय पार्वतीजी की माँ कहती हैं कि इनसे मेरी पुत्री का विवाह नहीं हो सकता भले वह कुंवारी ही रह जाये, और पार्वती उन्हें समझाती हैं कि बात मानो और जो भाग्य में लिखा है वह तो होगा ही..)

फ़िर शहनाई के स्वर और मंत्रोच्चार...
ओम नमः शिवाय, ओ..म स्वाहा..ओम स्वाहा...

ओ.. जब शिव बाबा मंडवा गईले
होला मंगलाचार हो
बाबा पंडित वेद विचारे
होला गस्साचार हो
बजरबाटी की लगी झालरी
नागिन की अधिकार हो
विज मंडवा में नावन अईली
करे झंगन वडियार हो..
एगो नागिन गिले विदाई
********* (???)
********* (???)
कोरस - हो भभूति लगाय के
पालकी सजाय के.. हाँ..
हो शिवजी बिहाने चले...
(इस अन्तरे को समझना थोडा़ मुश्किल होता है, शायद शिवजी के मंडप में पहुँचने के बाद जब पंडित मंगलगान शुरु करते हैं और मंडप की सजावट का उल्लेख है, फ़िर शब्दों के खो जाने के कारण उसका पूर्ण अर्थ समझ में नहीं आता)

कोरस - आ..आ.आ.आ.आ.आ

तो कोमल रूप धरे शिवशंकर
खुशी भये नर-नारी हो
राजहि नाचन गान करईले
इज्जत रहें हमार हो
रहें वर साथी शिवशंकर से
केहू के ना पावल पार हो
इनके जटा से गंगा बहिली
महिमा अगम अपार हो..
जब शिवशंकर ध्यान लगाये
इनको तीनो लोक दिखाये
कहे दुःखहरन यही
******* (???)

कोरस - भभूति लगाय के
पालकी सजाय के हाँ..
(इस अंतरे में शिव की महिमा का गुणगान किया गया है । जब सभी के परेशान हो चुकने के बाद शंकर जी औघड़ बाबा वाला चोला छोडकर कोमल रूप धारण कर लेते हैं और सभी लोग खुश हो जाते हैं)
गीत में प्रत्येक अन्तरे के शुरु होने से पहले जो डमरू और ढोल का धूमधडाका किया जाता है, उससे एक मस्ती भरी बारात का दृश्य जीवन्त हो उठता है, इसे कहते हैं संगीत से माहौल रचना..
बहनों और भाईयों, अब गीत एक बार फ़िर सुनिये, और अपनी राय, सुझावों, मेरी गलतियों से मुझे अवगत करायें...इस मामले में यूनुस भाई मेरी कुछ मदद कर सकें ...

Tuesday, 26 June, 2007

प्रकाश प्रदूषण : एक धीमा जहर ?

पाठकगण शीर्षक देखकर चौंकेंगे, लेकिन यह एक हकीकत है कि धीरे-धीरे हम जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण के बाद अब प्रकाश प्रदूषण के भी शिकार हो रहे हैं । प्रकाश प्रदूषण क्या है ? आजकल बडे़ शहरों एवं महानगरों में सडकों, चौराहों एवं मुख्य सरकारी और व्यावसायिक इमारतों पर तेज रोशनी की जाती है, जिसका स्रोत या तो हेलोजन लैम्प, सोडियम वेपर लैम्प अथवा तेज नियोन लाईटें होती हैं । उपग्रह से पृथ्वी के जो चित्र लिये गये हैं उसमें टोकियो और जापान का कुछ हिस्सा, पश्चिमी यूरोप के लन्दन और फ़्रैंकफ़ुर्ट और अमेरिका के शिकागो और न्यूयार्क शहरों की तेज रोशनी के चित्र स्पष्ट तौर पर नजर आते हैं, इससे कल्पना की जा सकती है कि इन महानगरो में रात के समय कितनी तेज रोशनी होती है । रात्रि के समय इस प्रकार के तेज प्रकाश से नागरिक तो खुश होते हैं और उन्हें कोई असुविधा नहीं होती, लेकिन पर्यावरण एवं छोटे-छोटे जीव-जंतुओं पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है । सबसे पहले बात प्रकृतिप्रेमियों की, इन शहरों के लोग आसपास की तेज रोशनी के कारण आकाशगंगा को ही ठीक से नहीं देख पाते । मुम्बई के किसी मुख्य चौराहे पर खडे होकर हम अधिक से अधिक २५० तारे देख सकते हैं, लेकिन शहर के बाहर निकलने पर किसी अन्धेरे स्थान पर खडे होकर हमें नंगी आँखों से २५०० से अधिक नक्षत्र और तारे आसानी से दिख जाते हैं । यह कोई मुख्य समस्या नहीं है, बल्कि असल बात तो यह है कि रात्रिकालीन तेज प्रकाश के कारण अनेक पक्षी, कीट-पतंगे अपना रास्ता भूल जाते हैं और भटक कर रोशनी के स्रोतों से टकराते रहते हैं । एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग दस करोड़ पक्षी ऊँची इमारतों से टकराकर मर जाते हैं । वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रॉड क्राफ़ोर्ड के अनुसार "पहले आमतौर पर दिखाई दे जाने वाले कई कीट हमारी नजरों से दूर होते जा रहे हैं, कुछ छोटे पतंगे तो शहरों से लगभग लुप्तप्राय होने लगे हैं, क्योंकि रात की तेज रोशनी में वे अपना सफ़र नहीं कर पाते और उनके प्राकृतिक "मिलन" के लिये जो रात का कम समय मिल पाता है, उसमें भी कमी हो गई है । साथ ही तेज प्रकाश के कारण वे बडे पक्षियों के शिकार बन जाते हैं । इसी प्रकार एक जीव विज्ञानी डॉ. मारिआन मूर, जिन्होंने झीलों के सूक्ष्म जीवों (zooplanktons) पर गहन अनुसन्धान किया है, कहते हैं "तालाब या झील के ये सूक्ष्म जीव रात के समय पानी की सतह पर आकर जल शैवालों का भक्षण करते हैं, लेकिन नदी या झीलों के किनारे तेज प्रकाश के कारण वे सतह पर आने से कतराते हैं और उन्हें अधिक समय पानी के नीचे ही गुजारना पड़ता है, इसलिये सतह पर शैवालों (Algae) का बढना जारी रहता है जिसके कारण अन्य दूसरी जलीय वनस्पतियों को पनपने का मौका ही नहीं मिलता । चन्द्रमा के नैसर्गिक प्रकाश में इन विविध प्राणियों को सहवास का जो समय मिलता है वह अब तेज रोशनी के कारण होने वाले दिमागी भ्रम के कारण नहीं मिलता, इस कारण लाखों प्रजातियाँ लुप्त होने की कगार पर आ गई हैं ।

(यह चित्र अमेरिका में रात होते समय का उपग्रह से लिया गया है, जिसमें अमेरिका के चकाचौंध शहर साफ़ दिखाई देते हैं)
हालांकि लोग कहते हैं कि मनुष्य की सुविधा और अपराधों पर नियन्त्रण के लिये रात में तेज प्रकाश आवश्यक है और उसके कारण पर्यावरण को होने वाले नुकसान की परवाह नहीं करना चाहिये, लेकिन इस तेज प्रकाश का मनुष्यों पर भी घातक प्रभाव पड़ रहा हो तब तो हमें सचेत हो ही जाना चाहिये । "नेशनल कैन्सर इंस्टिट्यूट" की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक प्रकाश की अपेक्षा रात्रिकालीन प्रकाश में अधिक देर तक रहने से कैंसर का खतरा बढ जाता है । रिपोर्ट के अध्ययन के अनुसार जो स्त्रियाँ नाईट शिफ़्ट में काम करती हैं, उनमें स्तन कैंसर की मात्रा अधिक पाई गई, इसी प्रकार बोस्टन के एक अस्पताल में किये गये शोध के अनुसार रात्रि पाली में काम करने वाली नर्सों में कैंसर की सम्भावना 36% तक बढ गई थी । दरअसल, तेज प्रकाश के कारण शरीर में मेलाटोनिन के निर्माण में कमी आती है, इस हार्मोन पर शरीर के "चक्र" का दारोमदार होता है, जिससे यह चक्र गडबडा़ जाता है । मेलेटोनिन में Antioxidant गुण होते हैं, इनमें कमी के कारण Astrogen का निर्माण भी बाधित होता है और अन्ततः यही कैंसर का कारण बनता है ।

(इस चित्र में जापान, यूरोप, दुबई, और अमेरिका के बडे शहरों को आसानी से चिन्हित किया जा सकता है)

नैसर्गिक प्रकाश मनुष्य या प्राणी के शरीर के लिये औषधि का काम करता है, लेकिन कृत्रिम प्रकाश का अधिकाधिक उपयोग बीमारियों को बढा़ता जा रहा है । यह एक सामान्य सा स्थापित तथ्य है कि जिन घरों में सूर्य का प्रकाश अधिक देर तक रहता है, वहाँ लोग अधिक स्वस्थ रहते हैं । नॉर्वे, स्वीडन आदि स्कैंडेनेवियाई देशों के नागरिक सूर्य देखने के लिये तरस जाते हैं, वहाँ कई बार चार-छः महीनों तक धूप ही नहीं निकलती । विदेशी पर्यटक यूँ ही नहीं गोवा और कोवलम के बीचों पर नंग-धडंग पडे़ रहते, बल्कि धूप से अधिक देर तक दूर रहने के कारण उनको त्वचा कैंसर का खतरा होता है, इसलिये डॉक्टर उन्हें "धूप-स्नान" की सलाह देते हैं । हम भारतवासी सौभाग्यशाली हैं कि हमें धूप, ठंड और बारिश लगभग समानुपात में मिलती है (ये और बात है कि हम उसकी कद्र नहीं करते) । सामान्यतः एक बडे़ बल्ब की प्रखरता 2900 ल्यूमेन्स होती है, जबकि फ़्लोरोसेंट ट्यूब की 7750, मरकरी लैम्प की 19100, कम प्रेशर के सोडियम लैम्प की 33000, अधिक दबाव वाले सोडियम लैम्प की 45000 और मेटल हेलाईड के प्रकाश की तीव्रता 71000 ल्यूमेन्स होती है । इसके कारण इनके आसपास के वातावरण के तापमान में भारी वृद्धि हो जाती है । स्टेडियमों में लगने वाले बल्बों से अल्ट्रावॉयलेट किरणें एवं अन्य उच्च दाब के प्रकाश से इन्फ़्रारेड किरणें निकलती हैं, और यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इन किरणों का मनुष्य के शरीर पर क्या प्रभाव पडता है । यदि किसी बडे शहर की सभी सार्वजनिक लाईटों को दो सौ वॉट की बजाय सौ वॉट एवं ढाई सौ की बजाय डेढ सौ वॉट में बदल दिया जाये तो कितनी ऊर्जा और बिजली की बचत होगी । इमारतों और सडकों पर उतना ही प्रकाश होना चाहिये जितनी जरूरत है, खामख्वाह आँखें चौंधियाने वाले प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं है और ऐसा अभी सिद्ध नहीं हुआ है कि अंधेरी रातों में अधिक चोरियाँ होती हैं, बल्कि पुलिस के अनुसार सेंधमारी और लूट दिन के वक्त ज्यादा होती है, जब घरों में कोई नहीं होता । इसलिये समय आ गया है कि सभी नगरीय प्रशासनिक संस्थायें इस दिशा में विचार करें, वैसे ही हमारे देश में बिजली की कमी है, फ़िर क्यों उसका इस तरह से अपव्यय किया जाये ? साथ ही स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिये तो यह हितैषी होगा ही, कि हम सब मिलकर कटौती करने की कोशिश करें । बडे़-बडे़ शोरूमों और कम्पनियों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने यहाँ गैरजरूरी लाईटों में कमी करें, साईन बोर्ड रात के दस बजे तक ही चालू रखें । नगरपालिकायें सडक की बत्तियाँ एक खंभा छोडकर एक पर जलायें । यही बात घरों पर भी लागू करने की कोशिश करें और ट्यूबलाईटों को निकालकर CFL का अधिकाधिक प्रयोग शुरु करें, साथ ही यह भी याद करने की कोशिश करें कि पिछली बार आपने "जुगनू" कब देखा था ?
स्व-आचार संहिता : इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री एवं लेखों पर आधारित

Monday, 25 June, 2007

बीबियाँ ऐसे धमकाती होंगी ?

हमेशा उत्सुकता होती है कि किसी प्रोफ़ेशन को लेकर बीबियाँ कैसे अपने-अपने पतियों को धमकाती होंगी ?

पायलट को : उडा़कर रख दूँगी
मन्त्री को : बस बहुत हुए आश्वासन
शिक्षक को : मुझे मत सिखाओ
पेंटर को : चेहरा लाल कर दूँगी
कारपेंटर को : ठोक कर सीधा कर दूँगी
डेंटिस्ट को : दाँत निकालकर हाथ में दे दूँगी
अभिनेता को : बस बहुत हुआ तुम्हारा नाटक
किराने वाले को : मुझे पुडिया मत दो, मैं तुम्हें खूब समझती हूँ
कम्प्यूटर वाले को : खबरदार, सारी हार्ड डिस्क फ़ॉरमेट कर दूँगी
ठेकेदार को : क्या मैंने तुम्हारा ठेका लिया है
मैकेनिक को : सारे नट-बोल्ट कस के रख दूँगी
धोबी को : ज्यादा चूं-चपड की तो धोकर रख दूँगी

और अन्त में...
ब्लॉगर को : तुम्हारा कच्चा चिठ्ठा खोलकर रख दूँगी..

ब्लॉगर बन्धु अपने-अपने "अनुभवों" पर आधारित टिप्पणियाँ इसमें जोड़ सकते हैं.... :)

Sunday, 24 June, 2007

पिता : घर का अस्तित्व

"माँ" घर का मंगल होती है तो पिता घर का "अस्तित्व" होता है, परन्तु इस अस्तित्व को क्या कभी हमनें सच में पूरी तरह समझा है ? पिता का अत्यधिक महत्व होने के बावजूद उनके बारे में अधिक बोला / लिखा नहीं जाता, क्यों ? कोई भी अध्यापक माँ के बारे में अधिक समय बोलता रहता है, संत-महात्माओं ने माँ का महत्व अधिक बखान किया है, देवी-देवताओं में भी "माँ" का गुणगान भरा पडा़ है, हमेशा अच्छी बातों को माँ की उपमा दी जाती है, पिता के बारे में कुछ खास नहीं बोला जाता । कुछ लेखकों ने बाप का चित्रण किया भी है तो गुस्सैल, व्यसनी, मार-पीट करने वाला इत्यादि । समाज में एक-दो प्रतिशत बाप वैसे होंगे भी, लेकिन अच्छे पिताओं के बारे में क्यों अधिक नहीं लिखा जाता, क्यों हमेशा पुरुष को भावनाशून्य या पत्थरदिल समझा जाता है ? माँ के पास आँसू हैं तो पिता के पास संयम । माँ तो रो-धो कर तनावमुक्त हो जाती है, लेकिन सांत्वना हमेशा पिता ही देता है, और यह नहीं भूलना चाहिये कि रोने वाले से अधिक तनाव सांत्वना / समझाईश देने वाले को होता है । दमकती ज्योति की तारीफ़ हर कोई करता है, लेकिन माथे पर तेल रखे देर तक गरम रहने वाले दीपक को कोई श्रेय नहीं दिया जाता । रोज का खाना बनाने वाली माँ हमें याद रहती है, लेकिन जीवन भर के खाने की व्यवस्था करने वाला बाप हम भूल जाते हैं । माँ रोती है, बाप नहीं रो सकता, खुद का पिता मर जाये फ़िर भी नहीं रो सकता, क्योंकि छोटे भाईयों को संभालना है, माँ की मृत्यु हो जाये भी वह नहीं रोता क्योंकि बहनों को सहारा देना होता है, पत्नी हमेशा के लिये साथ छोड जाये फ़िर भी नहीं रो सकता, क्योंकि बच्चों को सांत्वना देनी होती है । जीजाबाई ने शिवाजी निर्माण किया ऐसा कहा जाता है, लेकिन उसी समय शहाजी राजा की विकट स्थितियाँ नहीं भूलना चाहिये, देवकी-यशोदा की तारीफ़ करना चाहिये, लेकिन बाढ में सिर पर टोकरा उठाये वासुदेव को नहीं भूलना चाहिये... राम भले ही कौशल्या का पुत्र हो लेकिन उनके वियोग में तड़प कर जान देने वाले दशरथ ही थे । पिता की एडी़ घिसी हुई चप्पल देखकर उनका प्रेम समझ मे आता है, उनकी छेदों वाली बनियान देखकर हमें महसूस होता है कि हमारे हिस्से के भाग्य के छेद उन्होंने ले लिये हैं... लड़की को गाऊन ला देंगे, बेटे को ट्रैक सूट ला देंगे, लेकिन खुद पुरानी पैंट पहनते रहेंगे । बेटा कटिंग पर पचास रुपये खर्च कर डालता है और बेटी ब्यूटी पार्लर में, लेकिन दाढी़ की क्रीम खत्म होने पर एकाध बार नहाने के साबुन से ही दाढी बनाने वाला पिता बहुतों ने देखा होगा... बाप बीमार नहीं पडता, बीमार हो भी जाये तो तुरन्त अस्पताल नहीं जाते, डॉक्टर ने एकाध महीने का आराम बता दिया तो उसके माथे की सिलवटें गहरी हो जाती हैं, क्योंकि लड़की की शादी करनी है, बेटे की शिक्षा अभी अधूरी है... आय ना होने के बावजूद बेटे-बेटी को मेडिकल / इंजीनियरिंग में प्रवेश करवाता है.. कैसे भी "ऎड्जस्ट" करके बेटे को हर महीने पैसे भिजवाता है.. (वही बेटा पैसा आने पर दोस्तों को पार्टी देता है) । पिता घर का अस्तित्व होता है, क्योंकि जिस घर में पिता होता है उस घर पर कोई बुरी नजर नहीं डालता, वह भले ही कुछ ना करता हो या ना करने के काबिल हो, लेकिन "कर्तापुरुष" के पद पर आसीन तो होता ही है और घर की मर्यादा का खयाल रखता है.. किसी भी परीक्षा के परिणाम आने पर माँ हमें प्रिय लगती है, क्योंकि वह तारीफ़ करती है, पुचकारती है, हमारा गुणगान करती है, लेकिन चुपचाप जाकर मिठाई का पैकेट लाने वाला पिता अक्सर बैकग्राऊँड में चला जाता है... पहली-पहली बार माँ बनने पर स्त्री की खूब मिजाजपुर्सी होती है, खातिरदारी की जाती है (स्वाभाविक भी है..आखिर उसने कष्ट उठाये हैं), लेकिन अस्पताल के बरामदे में बेचैनी से घूमने वाला, ब्लड ग्रुप की मैचिंग के लिये अस्वस्थ, दवाईयों के लिये भागदौड करने वाले बेचारे बाप को सभी नजरअंदाज कर देते हैं... ठोकर लगे या हल्का सा जलने पर "ओ..माँ" शब्द ही बाहर निकलता है, लेकिन बिलकुल पास से एक ट्रक गुजर जाये तो "बाप..रे" ही मुँह से निकलता है । जाहिर है कि छोटी मुसीबतों के लिये माँ और बडे़ संकटों के लिये बाप याद आता है...। शादी-ब्याह आदि मंगल प्रसंगों पर सभी जाते हैं लेकिन मय्यत में बाप को ही जाना पड़ता है.. जवान बेटा रात को देर से घर आता है तो बाप ही दरवाजा खोलता है, बेटे की नौकरी के लिये ऐरे-गैरों के आगे गिड़गिडा़ता, घिघियाता, बेटी के विवाह के लिये पत्रिका लिये दर-दर घूमता हुआ, घर की बात बाहर ना आने पाये इसके लिये मानसिक तनाव सहता हुआ.. बाप.. सच में कितना महान होता है ना !
(यह एक मराठी रचना का अनुवाद है)

Friday, 22 June, 2007

बरसात पर एक कालजयी गाना

देश के कुछ हिस्सों में बारिश ने अपनी खुश-आमदीद दर्ज करवा दी है, और कुछ में सौंधी खुशबुओं ने समाँ बाँधना शुरु कर दिया है । बरसात के मौसम पर हिन्दी फ़िल्मों मे दर्जनों गीत हैं, बारिश तो मानो गीतकारों के लिये एक "पार्टी" की तरह होती है, एक से बढकर एक गीत लिखे गये बरसात पर, लेकिन जब भी झूम कर बारिश होती है, यह गीत सबसे पहले जुबाँ पर आता है । गाया है सुमन कल्याणपूर और कमल बारोट ने, लिखा है साहिर साहब ने और तर्ज बनाई है रोशन ने, फ़िल्म का नाम है बरसात की रात । इस गीत का प्रारम्भ म्यूजिक के जिस टुकडे़ से होता है, बरसों तक वह धुन विविध भारती के संगीत सरिता की "सिग्नेचर ट्यून" रही । गीत कुछ इस प्रकार है -

गरजत बरसत सावन आयो रे..
गरजत बरसत सावन आयो रे..
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय..
गरजत बरसत...

(१) रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे
बरसे, मेघा...
रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसे
तरसे जियरवा मीन समान
पड गई पी की लाल चुनरिया
पिया नहीं आये
गरजत बरसत सावन आयो रे...

(२) पल-पल छिन-छिन पवन झकोरे (३ बार)
लागे तन पर तीर समान, तीर समान
सखी लागे तन पर तीर समान
नैनन ढले तो भीगी सजरिया
अगन लगाये...
गरजत-बरसत सावन आयो रे...
लायो ना संग में हमरे बिछडे बलमवा
सखी का करुँ हाय... गरजत-बरसत..



इस प्रकार हमें भिगोता हुआ यह गीत रागों के साथ समाप्त हो जाता है... फ़िर सुनने वाले को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि यह किस राग पर आधारित है, क्योंकि बारिश में अगर संगीत का साथ है तो फ़िर मन वैसे ही मोर हो जाता है । इस गीत में साहिर ने दो सहेलियों की आपसी छेड़छाड़, उनके प्रेमियों का बरसात में ना आना और उसके कारण उनके तड़पने का सुन्दर वर्णन किया है.. "पवन झकोरे तन पर तीर समान लगते हैं" और "रिमझिम-रिमझिम मेघा बरसने में जिया मीन समान तडपे" एक कोमल लेकिन मन को तृप्त करने वाली शब्द रचना है, और संगीत के तो क्या कहने... रौशन साहब मानो बरसती बूँदों का अपनी धुन और साजों से एक माहौल रच देते हैं और श्रोता सुनते-सुनते स्वतः को बाहर बरामदे में भीगता हुआ पाता है.. । इस गीत में कमल बारोट की आवाज है, जिन्होंने एकल गीत कम ही गाये हैं, लेकिन युगल में लता, आशा, सुमन, महेन्द्र कपूर और रफ़ी आदि के साथ काफ़ी गीत गाये हैं । इनका एक और उल्लेखनीय गीत है पारसमणि फ़िल्म का "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..", उनकी आवाज एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि लिये हुए है, जो कम ही सुनने में आती है...। इसी प्रकार सुमन कल्याणपूर को एक बार लता का विकल्प कहा गया था, उन्होंने गीत भी वैसे ही गाये हैं और कहीं-कहीं तो सुमन को सुनकर लता का आभास भी होता है, जैसे "अजहुँ ना आये बालमा, सावन बीता जाये" अथवा "जूही की कली मेरी लाड़ली" जैसे गीतों में... । बहरहाल... इस गीत को यहाँ क्लिक करके सुनिये और भीगने का आनन्द लीजिये...
(प्रस्तुत चित्र एक दुर्लभ चित्र है जिसमें तलत महमूद, रफ़ी, किशोर, मुकेश, जी.एम.दुर्रानी, मीना कपूर, गीता दत्त, कमल बारोट, मुबारक बेगम इत्यादि दिखाई दे रहे हैं - चित्र www.talatmahmood.net से लिया गया है)

Wednesday, 20 June, 2007

बीती ना बिताई रैना.. : परिचय

गुलजार और आर.डी.बर्मन की अदभुत जोडी़ ने हमें कई-कई मधुर गीत दिये हैं, उन्हीं में से यह एक गीत है । शब्दों में गुलजार की छाप स्पष्ट नजर आती है (उलझाव वाले शब्द जो ठहरे) और गीत की धुन पंचम दा ने बहुत ही उम्दा बनाई है । गीत की खासियत लता मंगेशकर के साथ भूपेन्द्र की आवाज है, लता के साथ भूपेन्द्र ने जितने भी गीत गाये हैं सभी के सभी कुछ खास ही हैं (जैसे "किनारा" फ़िल्म का "मेरी आवाज ही पहचान है" या "मौसम" का दिल ढूँढता है आदि), वही जादू इस गीत में भी बरकरार है, फ़िल्म है "परिचय"..

लता की जादुई आवाज से गीत शुरू होता है..
बीती ना बिताई रैना
बिरहा की जाई रैना
भीगी हुई अँखियों ने लाख बुझाई रैना..
बीती ना बिताई रैना

(१) बीती हुई बतियाँ कोई दोहराये
भूले हुए नामों से कोई तो बुलाये
चाँद..चाँद.. ओ..ओ..ओ..
अचानक भूपेन्द्र की धीर-गम्भीर आवाज उभरती है
चाँद की बिन्दी वाली, बिन्दी वाली रतियाँ
जागी हुई अँखियों में रात ना आई रैना...
बीती ना बिताई रैना....
अगला अन्तरा भूपेन्द्र की आवाज में शुरु होता है...
(२) युग आते हैं, और युग जायें
छोटी-छोटी यादों के पल नहीं जायें...

अब फ़िर लता की आवाज -
झूठ से काली लागे, लागे काली रतियाँ
रूठी हुई अँखियों में लाख मनाई रैना..
बीती ना बिताई रैना...

इस प्रकार यह क्लासिकल गाना हमें एक मोड़ पर लाकर छोड़ देता है । "चाँद की बिन्दी वाली रात" हो या "रूठी हुई आँखों में बिताई हुई लम्बी रात" हो, गुलजार हमेशा कुछ विचित्र से विशेषणों का उपयोग करते हैं, जो अच्छे भी लगते हैं चाहे वह "महकती हुई आँखों की खुशबू" (खामोशी) हो, या फ़िर "कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज कदम राहें" (आँधी) हो, या फ़िर "जिगर से बीडी जलाने की" (ओंकारा) बात हो, गुलजार सदा ही विशिष्ट दिखाई देते हैं । लोगों को हमेशा लगता रहा है कि आर.डी.बर्मन का सर्वश्रेष्ठ हमेशा गुलजार के साथ काम करते हुए आता था, सही भी है । इस गीत में एक जगह पर फ़िल्म में संजीव कुमार खाँसते-खाँसते रुक जाते हैं और उस वक्त उनकी बेटी जया भादुडी गीत पूरा करती हैं, यह खाँसी की आवाज किसी रिकॉर्ड पर अंकित है । संजीव कुमार और जया भादुडी़ किस ऊँचे कैलिबर के कलाकार हैं और उनके अभिनय की रेंज इस उदाहरण से स्पष्ट होती है कि, "परिचय" में वे जया भादुडी के पिता बने हैं, "कोशिश" में दोनों गूँगे-बहरे पति-पत्नी बने हैं, "शोले" में ससुर और बहू के रूप में, "नौकर" में प्रेमी-प्रेमिका के रोल में, "सिलसिला" में दुविधाग्रस्त विपरीत जोडी़ के रूप में... तात्पर्य यह कि यह जोडी़ किसी भी रूप में हमारे सामने आई हो, इन्होंने अपने अभिनय से हमें चमत्कृत ही किया है... कितना मुश्किल होता होगा ऐसा अभिनय कि अलग-अलग फ़िल्मों में एक ही हीरोईन के साथ विभिन्न प्रकार के रोल करना, न सिर्फ़ करना साथ में दर्शकों को विश्वास भी दिलाना, कहने की जरूरत नही कि इसमे संजीव-जया सफ़ल रहे हैं । हालांकि परिचय में संजीव कुमार "गेस्ट रोल" में ही हैं, लेकिन फ़िर भी उतने से वक्फ़े में फ़िल्म पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं... गुलजार साहब के पसन्दीदा कलाकारों में संजीव कुमार और विनोद खन्ना रहे हैं, और इनके निर्देशन में दोनों ने बेहतरीन काम किया है । बहरहाल.. इस मधुर गीत को आप यहाँ क्लिक करके सुन सकते हैं ।

महाकालेश्वर मन्दिर में धर्म के नाम पर...

बारह ज्योतिर्लिंगों में से सबसे बडे़ आकार वाले और महत्वपूर्ण "महाकालेश्वर" मन्दिर का ऑडिट सम्पन्न हुआ । यह ऑडिट सिंहस्थ-२००४ के बाद में मन्दिर को मिले दान और उसके रखरखाव के बारे में था । इसमें ऑडिट दल को कई चौंकाने वाली जानकारियाँ मिलीं, दान के पैसों और आभूषणों में भारी भ्रष्टाचार और हेराफ़ेरी हुई है । ऑडिट दल यह जानकर आश्चर्यचकित हो गया कि मन्दिर को भेंट में मिले आभूषणों का वजन नहीं किया जाता, ऐसे में ऑडिट कैसे किया जाये ? ऑडिट टीम ने पहले ही दिन एक बडा़ घपला पकड़ लिया जिसमें एक रसीद कट्टे में 7000 रुपये को 700.00 रुपये कर दिया गया था, इसके लिये एक जीरो को दशमलव बना दिया गया और आगे एक जीरो लगा दिया गया, ऐसा शून्य वाली कई रसीदों में पाया गया, कभी 51 को 5/- बना दिया गया, कभी 101 को 10/- बना दिया है, कुछ रसीदों की कार्बन कॉपी को रबर से ही मिटा दिया गया है, ऐसे में यह भी नहीं पता कि उस रसीद में कितना दान मिला था । ऑडिट दल को पहले ही दिन लगभग 65000 रुपये की हेराफ़ेरी के बारे में पता चल गया जो कि मन्दिर कर्मचारियों ने हजम कर ली है । इसी प्रकार सोने के पाँच आभूषणों की रसीद है, लेकिन स्टॉक रजिस्टर में उसकी आमद दर्ज नहीं है, सात चाँदी के छत्र मिलाकर कुल २० आभूषण रसीद पर तो हैं, लेकिन स्टॉक में नहीं हैं । दान लेने वाले कर्मचारियों ने समझदारी (?) दिखाते हुए किसी भी आभूषण की रसीद पर उसका वजन अंकित नहीं किया है, ऐसे में अन्दाजा लगाना भी मुश्किल है कि वह आभूषण १०० ग्राम का था या १० ग्राम का ? ऑडिट दल को सन्देह है कि वजन नहीं लिखने के पीछे कारण यह है कि बाद में दूसरे हल्के कम वजन के आभूषणों को उसकी जगह रखा जा सके, बिछिया, नाग, छत्र, चाँदी के पाट और न जाने क्या-क्या, किसी भी रसीद पर वजन अंकित नहीं है । ऐसे ही हमारे दानवीर लोग भी हैं, दान देने वाले ने कहीं सिर्फ़ अपना नाम और कहीं सिर्फ़ जगह का नाम लिखवाया है, जैसे रुपये १०,००० रामलाल की ओर से अथवा सोने के कुंडल जोधपुर वालों की ओर से आदि... अब ऑडिट वाले यदि पता भी करना चाहें कि वाकई दानदाता ने कितनी रकम दी थी, तो वे कैसे पता करें, यानी कि पूरा का पूरा माल खल्लास । कई कर्मचारियों का तबादला हो गया, कई रिटायर हो गये, किस रसीद पर किसके हस्ताक्षर हैं, कौन-कौन से कर्मचारी उस वक्त मन्दिर काऊंटर पर तैनात थे, किसी को कुछ भी पता नहीं... प्रथम दृष्टया यह एक बडे घोटाले की ओर संकेत करता है । मजे की बात यह है कि एक "साम्प्रदायिक" (?) सरकार ने पहली बार प्रदेश के १२५ मन्दिरों का ऑडिट करवाने का निर्णय लिया और इसके लिये बाकायदा गजट नोटिफ़िकेशन जारी किया गया और महाकालेश्वर के दरबार से ही इसकी शुरुआत की, अब आगे-आगे देखिये होता है क्या ? जाँच दल अब तक कलेक्टर को इस सम्बन्ध में १६ पत्र लिख चुका है और मन्दिर प्रशासक ने जो समिति बनाई है, उसमें अकाऊंट विभाग के कर्मचारी भी हैं, जबकि ऑडिट वालों ने इन्ही कर्मचारियों को सन्देह के दायरे में रखा है, बात साफ़ है कि "भारत की महान परम्परा" (!) के अनुसार सिर्फ़ लीपापोती कर दी जायेगी, होना-जाना कुछ नहीं है । जैसा कि तिरुपति मन्दिर के लड्डू घोटाले के समय हुआ था, जिन भाईयों को जानकारी नहीं है उन्हें बता दूँ कि कुछ वर्षॊं पूर्व प्रसिद्ध तिरुपति मन्दिर में भी एक महाकाय घोटाला पकड़ में आया था । हुआ यूँ था कि तिरुपति में प्रसाद के रूप में एक किलो का विशाल लड्डू भक्तों को बेचा जाता है, ताकि वे अपने घर ले जा सकें और दूसरों में बाँट सकें, यह लड्डू सूखे मेवों, काजू, किशमिश आदि से बनता है और महंगा होता है (लागत में) और वह भक्तों को "नो प्रॉफ़िट नो लॉस" पर बेचा जाता है । अब भारतीयों का उम्दा भ्रष्टाचारी दिमाग देखिये - एक किलो के लड्डू को पापियों ने ९०० ग्राम या ९५० ग्राम का कर दिया और उस ५०-१०० ग्राम में से काजू, बदाम, पिस्ते बेच खाये, और यह वर्षों से चल रहा था, अब सोचिये कितने करोडों के वारे-न्यारे कर लिये गये होंगे वह भी धर्म और आस्था के नाम पर । कोई भक्त इतना नीच नहीं सोच सकता कि चलो लड्डू को तुलवाकर देख लें.. इसका फ़ायदा दुराचारियों ने उठाया और लाखों-करोडों रुपये सिर्फ़ लड्डू के वजन में थोडा़ सा फ़र्क करके खा लिये । देखा आपने उर्वर दिमाग ! यहाँ भ्रष्टाचार रग-रग में इतना समा चुका है कि करने वाले को शर्म आना तो दूर वह रिश्वत को अपना हक समझने लगा है । लोगबाग मन्दिर के चन्दे के पैसे खा सकते हैं, श्मशान घाट की लकडि़यों में कमीशन खा सकते हैं, विकलांग बच्चों की बैसाखियों और ट्रायसिकल में रिश्वत खा सकते हैं, मध्यान्ह भोजन योजना में गरीब बच्चों का दलिया और तेल खा जाते हैं, सरकारी अस्पतालों में रोगी कल्याण समितियों से गरीबों को मिलने वाली मुफ़्त दवा बेच खाते हैं.. गरज कि जिसे जहाँ मौका मिल रहा है सिर्फ़ खा रहा है...सरकार का तो डर पहले से ही नहीं था और अब भगवान का डर भी खत्म हो गया है, क्योंकि उसके दलाल चारों तरफ़ फ़ैले हुए हैं जो पापियों से कहते हैं "इतना दान कर दो.. तो इतने पाप धुल जायेंगे", "यदि एक बार भंडारा करवा दिया तो तुम्हें पुण्य मिलेगा", "नवरात्रि में विशाल कन्या भोज करवा दो, भ्रूण हत्या का पाप कम लगेगा"...मेरे मत में मन्दिरों में बढती दानदाताओं की भीड़ का अस्सी प्रतिशत हिस्सा उन लोगों का है जो भ्रष्ट, अनैतिक और गलत रास्तों से पैसा कमाते हैं और फ़िर अपनी अन्तरात्मा पर पडे बोझ को कम करने के लिये भगवान को भी रिश्वत देते हैं... किसी पण्डे/पुजारी/महाराज आदि नें कभी यह नहीं कहा कि "बच्चा तूने बहुत पाप किये हैं, जा कुछ दिन जेल में रहकर आ..." वह दलाल यही कहेगा कि भगत तू सोने का मुकुट तिरुपति को दान कर और मेरी दक्षिणा दे दे बस, तेरा काम (!) हो जायेगा...। इस दृष्टि से यदि देखा जाये तो महाकालेश्वर मन्दिर में हुई धाँधली के निहितार्थ हैं "चोरों को पड़ गये मोर"... एक ने माल कमाया, उससे भगवान को खुश (?) करने के लिये थोडा़ सा माल उधर सरकाया, उस माल को दूसरा चोर ले गया (यानी "मनी सर्कुलेशन", जो "बाजार" को मजबूत बनाता है)... यदि देश भर के मन्दिरों को दान देने वाले महापुरुषों और उन मठों, मन्दिरों और आश्रमों की वास्तविक आय और उसके स्रोत का पता लगाने की कोशिश की जाये, तो ऐसी सडाँध उठेगी कि...

Tuesday, 19 June, 2007

उज्जैन भी महानगर बन गया !

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