Sunday, 29 July, 2007

रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर दो अलबेले गीतों से पुष्पांजलि

रफ़ी साहब की पुण्यतिथि (31 जुलाई) के अवसर पर उनके बारे में कुछ लिखने की शुरुआत करूँ तो कहाँ से करूँ, क्योंकि उनके बारे में सब कुछ तो कहा जा चुका है, फ़िर भी कम लगता है, रफ़ी साहब की आवाज, उनकी गीतों की अदायगी, उनकी भलमनसाहत के बारे में काफ़ी कुछ पहले ही लिखा जा चुका है, अब और कुछ लिखना तो मात्र सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा । रफ़ी साहब के हजारों खूबसूरत गीतों में से एक या दो को चुनना ठीक वैसा ही है, जैसे खिलौने की दुकान में भ्रमित सा एक बच्चा... जो सोच-सोच कर हैरान है कि "क्या चुनूँ" ! फ़िर भी रफ़ी साहब को पुष्पांजलि पेश करते हुए मैने उनके दो गीतों का चुनाव किया है । और इन गीतों का चुनाव इसलिये किया कि ये हीरो की छवि के विपरीत स्वभाव वाले गीत हैं । अक्सर कहा जाता है (और यह सच भी है) कि रफ़ी साहब हों या लता या आशा अथवा किशोर कुमार... गीत गाने से पहले फ़िल्म में यह किस हीरो पर फ़िल्माया जाना है उसके बारे में जरूर पता करते थे, फ़िर उस हीरो या हीरोईन के अन्दाजे-बयाँ और अदाओं के हिसाब से वे अपनी आवाज को ढालते थे । प्रस्तुत दोनों गीतों का चयन मैने इसी आधार पर किया है कि जिससे श्रोताओं को रफ़ी साहब की " वाईड रेंज" के बारे में जानकारी मिल सके । नृत्य करते हुए दिलीप कुमार और बेहद गंभीर मुद्राओं में शम्मी कपूर की कल्पना करना कितना मुश्किल होता है ना... जबकि अधिकतर लोगों के दिमाग में "ट्रेजेडी किंग" और "याहू" की छवियाँ ऐसी कैद हैं कि चाहकर भी उन्हें नहीं भुलाया जा सकता । अब सोचिये कि मोहम्मद रफ़ी साहब को जब ये विपरीत स्वभाव वाले गीत गाने को कहा गया होगा तब गीत गाने से पहले उन्होंने "माइंड-सेट" कैसे किया होगा, क्योंकि वे इन गीतों को गाने से पहले इन अभिनेताओं की छवि के अनुरूप यूसुफ़ साहब के लिये बेहद दर्द भरे और शम्मी जी के लिए जोरदार उछलकूद वाले और कमर-हिलाऊ गीत गा चुके थे, लेकिन यहीं पर उनकी "मास्टरी" उभरकर सामने आती है...
पहला गीत मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ फ़िल्म "गंगा-जमुना" का लिखा है शकील बदायूँनी ने और धुन बनाई है नौशाद ने । इस फ़िल्म को पहली "अनऑफ़िशियल" भोजपुरी फ़िल्म कहा जा सकता है, क्योंकि इस फ़िल्म के नब्बे प्रतिशत संवादों और गीतों में भोजपुरी का उपयोग किया गया है । बोल हैं... "नैन लड़ जइहैं तो मनवा मा कसक होईबे करी..." यदि किसी को पता न हो कि ये गीत किस पर फ़िल्माया गया है तो उसके जेहन में दिलीप कुमार कतई नहीं आयेगा... इतनी मस्ती में यह गीत रफ़ी साहब ने गाया है कि यह सीधे आपको गाँव के मेले में ले जाता है और छेड़छाड़ भरे मासूम भोजपुरी शब्दों से आपको सराबोर कर देता है । नौशाद ने रफ़ी साहब से काफ़ी गीत गवाये हैं (अधिकतर दर्द भरे और गंभीर किस्म के), लेकिन इस गीत में दिलीप कुमार नृत्य भी करेंगे और गीत भोजपुरी में भी होगा यह रफ़ी साहब ने भी नहीं सोचा होगा... बहरहाल आप इस गीत को "यहाँ क्लिक करके" भी सुन सकते हैं और नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी । मस्ती में खो जाईये और रफ़ी साहब को याद कीजिये.... इस बार मैं शब्दों को नहीं लिख रहा हूँ ना ही धुन पर कुछ लिख रहा हूँ, आज बात होगी सिर्फ़ रफ़ी साहब की आवाज की ।

nain lad jai re to...


इसी प्रकार जो दूसरा गीत मैने चुना है वह है "मैं गाऊँ तुम सो जाओ..." फ़िल्म है ब्रह्मचारी, लिखा है हसरत जयपुरी ने, संगीत दिया है शंकर-जयकिशन ने और यह दर्दीली लोरी फ़िल्माई गई है शम्मी कपूर पर... शम्मी कपूर की जैसी खिलन्दड़ और याहू छवि है यह गीत उससे अलग हटकर है, फ़िल्म में अनाथ बच्चे भूखे हैं और सोने का प्रयत्न कर रहे हैं तथा शम्मी कपूर जो कि बेहद दुखी हैं, उन्हें यह लोरी गाकर सुलाने का प्रयास करते हैं । हालांकि शंकर-जयकिशन जो कि ऑर्केस्ट्रा के प्रयोग के मोह से बच नहीं पाते, इस गीत में भी साजों की काफ़ी आवाज है, फ़िर भी रफ़ी साहब ने बेहद कोमल अन्दाज और नीचे सुरों में उम्दा गीत गाया है (जैसे यह "फ़ुसफ़ुसाता सा यह गीत", या फ़िर "यह गीत") । इस लोरीनुमा गीत को आप "यहाँ क्लिक करके" सुन सकते हैं या विजेट में प्ले करके । आईये आवाज के इस देवदूत को सलाम करें, उनकी यादों में खो जायें और हमारी पीढी को रफ़ी-लता-आशा-किशोर-मुकेश आदि का तोहफ़ा देने के लिये ईश्वर को धन्यवाद दें ।
Main Gaaon Tum So ...


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Thursday, 26 July, 2007

"क्रेन बेदी" हार गईं ?

एक बार फ़िर से हमारी "व्यवस्था" एक होनहार और काबिल व्यक्ति के गले की फ़ाँस बन गई, टीवी पर किरण बेदी की आँखों में आँसू देखकर किसी भी देशभक्त व्यक्ति का खून खौलना स्वाभाविक है । (जिन लोगों को जानकारी नहीं है उनके लिये - किरण बेदी से दो साल जूनियर व्यक्ति को दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बना दिया गया है, जबकि उस पर गंभीर किस्म के आरोप हैं) हमारी भ्रष्ट व्यवस्था के आगे "क्रेन बेदी" के नाम से मशहूर एक फ़ौलादी महिला को जिस कदर दरकिनार कर दिया गया, उससे एक बार फ़िर स्पष्ट हो गया है कि इटली की महिला का "महिला सशक्तिकरण" का दावा कितना खोखला है । "त्याग", "बलिदान" और "संस्कृति" की दुहाई देने वाली एक औरत दिल्ली में सत्ता की केन्द्र है, एक और औरत उसकी रबर स्टाम्प है, एक गैर-लोकसभाई (गैर-जनाधारी)उसका "बबुआ" बना हुआ है तथा एक और महिला (शीला दीक्षित) की नाक के नीचे ये सारा खेल खेला जा रहा है, इससे बडी़ शर्म की बात इस देश के लिये नहीं हो सकती । शायद किरण बेदी का अपराध यह रहा कि वे सिर्फ़ "ईमानदारी" से काम करने में यकीन रखती हैं, उन्हें अपने अफ़सरों और मातहतों को दारू-पार्टियाँ देकर "खुश" करना नहीं आता । वे पुस्तकें लिखती हैं, कैदियों को सुधारती हैं, अनुशासन बनाती हैं, लेकिन वे यह साफ़-साफ़ भूल जाती हैं कि हमारे "कीचड़ से सने" नेताओं के लिये यह बात मायने नहीं रखती, उन्हें तो चाहिये "जी-हुजूर" करने वाले "नपुंसक और बिना रीढ़ वाले" अधिकारी, जो "खाओ और खाने दो" में यकीन रखते हैं । एक तरफ़ कलाम साहब कल ही 2020 तक देश को महाशक्ति बनाने के लिये सपने देखने की बात फ़रमा कर, सिर्फ़ दो सूटकेस लेकर राष्ट्रपति भवन से निकल गये, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली के बंगलों पर काबिज नेताओं और उनके लगुए-भगुओं को निकाल बाहर करने में पसीना आ रहा है, और ये भी मत भूलिये कि "महिला सशक्तिकरण" तो हुआ है, क्योंकि मोनिका बेदी छूट गई ना ! किरण बेदी की नाक भले ही रगड़ दी गई हो । क्या देश है और क्या घटिया व्यवस्था है ?
आईये हम सब मिलकर जोर से कहें - "इस व्यवस्था की तो %&^$*&&%**$% (इन स्टार युक्त चिन्हों के स्थान पर अपने-अपने गुस्से, अपनी-अपनी बेबसी और अपने-अपने संस्कारों के मुताबिक शब्द भर लें) और स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ रहा है... झूठा ही सही "मेरा भारत महान" कहने में किसी का क्या जाता है ?

Wednesday, 25 July, 2007

घनघोर चिल्लर संकट...

हाल ही में एक समाचार आया था कि उत्तरप्रदेश के एक शहर से लाखों रुपये की चिल्लर (१ और २ रुपये के सिक्के) बरामद किये गये,वहाँ उन्हें गलाया जा रहा था और उसकी सिल्लियाँ बनाकर बांग्लादेश भेजा जा रहा था । बांग्लादेश में भारत के एक रुपये के सिक्के की चार-पाँच ब्लेड (रेजर) बनाई जाती हैं । हालांकि इस खबर में कुछ नया नहीं है, लेकिन यह बताता है कि हमारा प्रशासन किस कदर बेखबर, और सोया हुआ रहता है । बडे़ महानगरों के बारे में तो नहीं पता, लेकिन हमारे मालवा क्षेत्र में पिछले २-३ महीने से चिल्लर संकट बहुत बढ गया है, उज्जैन, रतलाम, देवास, शाजापुर जैसे छोटे कस्बों में यह समस्या कुछ अधिक है । इसके कारण सबसे अधिक तकलीफ़ में हैं वे लोग या वे छोटे व्यापारी जिनका अधिकतर काम चिल्लर से ही चलता है । सब्जी बेचने वाले, पान वाले, बूट-पॉलिश वाले, हार-फ़ूल बेचने वाले, फ़ोटोकॉपी वाले, पीसीओ चलाने वाले, मतलब हजारों-हजार लोग इस समस्या से पीडि़त हैं, परन्तु सरकारी मशीनरी कान में तेल डाले बैठी है । जनरल स्टोर वाले या किराना वाले या सब्जी वाले तो इसका सामना कर लेते हैं, क्योंकि उनके पास एक रुपये या दो रुपये वाले कई आईटम होते हैं, माचिस, आलपिन, लिफ़ाफ़े, टॉफ़ियाँ वे कुछ भी दे सकते हैं, सब्जी वाले भी आजकल "राउंड फ़िगर" में सब्जी तौलते हैं, लेकिन मैं / हम (यानी फ़ोटोकॉपी का बिजनेस करने वाले) क्या करें, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति को चार फ़ोटोकॉपी करवानी हैं तो दो रुपये हुए (जी हाँ फ़ोटोकॉपी आज भी पचास पैसे ही है, जो दस-पन्द्रह साल पहले थी), तो क्या मैं उसे राउंड फ़िगर करने के लिये उसकी दस कॉपी कर सकता हूँ, नहीं कर सकता... कुछ दुकान वालों ने अपनी "व्यक्तिगत मुद्रा" चलन में ला दी है, कागज के एक टुकडे़ के एक-दो रुपये / आठ आने के कूपन बना दिये हैं वे कूपन उसी दुकान पर चल जायेंगे, क्या करें कुछ ना कुछ तो करना ही होगा न ! और ये आज की पीढी के नौजवानों का क्या कहना... "कॉमन सेंस" इन लोगों में बहुत "अनकॉमन" हो चला है, मुलाहिजा फ़रमायें.. घर से मार्कशीट की फ़ोटोकॉपी करवाने निकले हैं, जेब में है सौ रुपये का नोट, जैसे कि माने बैठे हैं कि दुकानदार तो चिल्लर की टकसाल खोले बैठा है...समस्या को बढाने में ATM ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें से पचास, बीस या दस के नोट नहीं निकलते... अब शाम को मजदूरों को पेमेंट करना है, किसी को चालीस, किसी को साठ, तो साला ATM कार्ड क्या करेगा ? क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने वालों का प्रतिशत कितना है ? सरकार कहती है कि बैंकों में चिल्लर की कोई कमी नहीं है, बैंक वालों को खुल्ले पैसे लेना होंगे... सरकार तो यह कह कर मुक्त हो गई, जरा जमीन पर उतर कर देखो अर्थशास्त्रियों.. बैंके साफ़-साफ़ मना कर देती हैं, खुल्ले के लेन-देन से, जो बन पडे़ सो कर लो... एकाध बैंक चिल्लर बाँटती भी है तो अहसान जता कर "एक हजार रुपये के सिक्के लेने होंगे कम से कम, जिसमें पाँच-पाँच के सौ सिक्के भी शामिल हैं".. अब बताईये पाँच के सौ सिक्के लेकर मैं क्या करूँ जबकि मुझे असली आवश्यकता एक रुपये के सिक्के की है...असल समस्या है भारतीयों की रग-रग में समाया हुआ भ्रष्टाचार.. यहाँ "चिता की लकडियों" में भी कमीशन खाया जाता है तो चिल्लर (राष्ट्रीय मुद्रा) की जमाखोरी और उसे बरबाद करने में कैसी शर्म... और जो पुलिसवेश्याओं के अड्डे जानती है, सटोरियों के ठीये जानती है, अवैध शराब की भट्टियाँ जानती है, वह सिक्कों को गलाने वाले माफ़िया के बारे में अन्जान होगी.. यह बात गले उतरने वाली नहीं है । राष्ट्रीय मुद्रा का हम कितना सम्मान करते हैं यह तो नोटों पर लिखे प्रेम संदेशों, गुणा-भाग या फ़िर महिलाओं की विशिष्ट जगह पर मुडे़-तुडे़, खुँसे हुए देखकर हो जाती है..अब सरकार कह रही है कि "हम प्लास्टिक के नोट छापेंगे"... चलिये इंतजार करें उन नोटों का, "भाई लोगों" ने पहले ही उसको ठिकाने लगाने का इंतजाम सोच रखा होगा...

Friday, 20 July, 2007

दाऊद भाई..पधारो ना म्हारे देस

दाऊद भाई, आपको ये पत्र लिखते हुए बहुत खुशी हो रही है, चारों तरफ़ खुशी जैसे पसरी हुई है, खुशी का कारण भी है, मोनिका "जी" को भोपाल की एक अदालत ने फ़र्जी पासपोर्ट मामले में बरी कर दिया है, जिसकी खुद मोनिका ने भी सपने में कल्पना नहीं की होगी, लेकिन कल्पना करने से क्या होता है, आप तो जानते ही हैं कि हमारे यहाँ का सिस्टम कैसा "यूजर-फ़्रेंण्डली" हो गया है (जो इस सिस्टम को "यूज़" करता है, ये सिस्टम उसका फ़्रेण्ड बन जाता है), अब आप हों या अबू भाई, कहीं भी बैठे-बैठे सारी जेलों को अपने तरीके से संचालित कर सकते हैं (मैं तो कहता हूँ कि सरकार को आपको जेल सुधार का ठेका दे देना चाहिये)... तो भाई, भूमिका बनाने का तात्पर्य यही है कि हम पलक-पाँवडे़ बिछाये बैठे हैं आपकी राहों में, क्यों खामख्वाह हमारे सीबीआई अधिकारियों को तकलीफ़ देते हो और हमारे गाढे़ पसीने की कमाई जैसी पुर्तगाल से अबू-मोनिका को लाने में बहाई गई, उसे दुबई या कहीं और बहने देना चाहते हो ? भाई सब कुछ तो आपका ही है, हमारे लिये जैसे आप, वैसे पप्पू यादव, वैसे ही शहाबुद्दीन, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता । तो भाई तारीख बताओ और आ जाओ.. मोनिका दीदी पहले ही फ़रमा चुकी हैं कि जेल से ज्यादा सुरक्षित जगह भारत में कोई नहीं है (देखा ! क्या रोशन ख्याल आया है संगत के असर से), एकदम सुरक्षित जेलें हैं यहाँ की, अदालतें भी, कानून भी, वकील भी उनके गुर्गे भी, सब से सब एकदम गऊ, आप जहाँ भी रहना चाहेंगे व्यवस्था करा दी जायेगी, अस्पताल में रहें तो भी कोई बात नहीं हम आप जैसों की सेहत का खयाल रखने वालों में से हैं, सच्ची कहता हूँ भाई खुदा ने चाहा तो एकाध साल में ही मोटे हो जाओगे, जब तक जी करे हमसे सेवा-चाकरी करवाओ, और जब जाने की इच्छा हो बोल देना, हम आपको फ़िर से हवाई जहाज का अपहरण करने की तकलीफ़ नहीं देंगे..वैसे ही छोड़ देंगे.. हाँ, लेकिन आने से पहले "मुझे भारतीय न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है" यह सूत्रवाक्य बोलना मत भूलना... फ़िर देखना कैसे हाथों-हाथ उठाये जाते हो हमारे चिरकुट मीडिया द्वारा, जो आपकी बरसों पुरानी फ़िल्में दिखा-दिखा कर ही टाईम पास कर रहा है, मुम्बई बम ब्लास्ट के चौदह साल बाद फ़ैसले आना शुरु हुए हैं और अभी सुप्रीम कोर्ट बाकी है, तो भाई आपकी बाकी की जिन्दगी तो आराम से कटना तय है यहाँ... फ़िर आपके भाई-बन्धु भी काफ़ी मौजूद हैं यहाँ पहले से ही, जहाँ चार यार मिल जायेंगे रातें गुलजार हो जायेंगी...
आपकी मदद के लिये यहाँ राजनैतिक पार्टियाँ हार-फ़ूल लिये तैयार खडी़ हैं, इधर आपने पावन धरती पर कदम रखा और उधर तड़ से आपकी संसद सदस्यता पक्की... फ़िर मानवाधिकार वाले हैं (जो सूअर के मानवाधिकार भी सुरक्षित रखते हैं)... कई "उद्दीन" जैसे शहाबुद्दीन, तस्लीमुद्दीन और सोहराबुद्दीन (कुछ सरेआम, कुछ छुपे हुए) भी मौजूद हैं जो आपको सर-माथे लेने को उतावले हो उठेंगे.. बस..बस अब मुझसे बयान नहीं किया जाता कि आपको कितनी-कितनी सुविधायें मिलने वाली हैं यहाँ...। मन पुलकित-पुलकित हो रहा है यह सोच-सोचकर ही कि जिस दिन आप इस "महान" देश में पधारेंगे क्या माहौल होगा...यहाँ पासपोर्ट की अदला-बदली आम बात है, कार से कुचलना और बरी होना तो बेहद मामूली बात है, और आप तो माशाअल्लाह.. अब आपकी तारीफ़ क्या करूँ, आपने बडे़ काम किये हैं कोई ऐरे-गैरे जेबकतरे या झुग्गी वाले थोडे़ ही ना हैं आप, अकेले मध्यप्रदेश में बडे़ उद्योगपतियों पर सिर्फ़ बिजली का हजारों करोड़ रुपया बकाया है, मतलब कि आप अकेले नहीं रहेंगे यहाँ... बस अब और मनुहार ना करवाओ... कराची, दुबई, मुम्बई पास-पास ही तो है...आ जाओ... कहीं मुशर्रफ़ का दिमाग सटक गया तो.. नहीं..नहीं.. रिस्क ना लो, आप तो दुनिया की सबसे "सेफ़" जगह पर आ ही जाओ... मैं इन्तजार कर रहा हूँ...

प्रिये प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी - शुद्ध हिन्दी गाना

हिन्दी फ़िल्मों में अक्सर गीतों को लिखते समय या उनके चित्रीकरण के समय कोई जरूरी नहीं है कि उनका आपस में कोई तालमेल हो ही...हिन्दी फ़िल्मी गीतों के इतिहास को देखें तो हिन्दी के शब्दों का अधिकतम प्रयोग करने वाले गीतकार कम ही हुए हैं, जैसे भरत व्यास, प्रदीप आदि । यह लगभग परम्परा का ही रूप ले चुका है कि उर्दू शब्दों का उपयोग तो गीतों में होगा ही (आजकल तो अंग्रेजी के शब्दों के बिना हिन्दी गीत नहीं बन पा रहे गीतकारों से) इसलिये यह गीत कुछ "अलग हट के" बनता है, क्योंकि इस गीत में शुद्ध हिन्दी शब्दों का खूबसूरती का प्रयोग किया गया है, और कई लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि गीत लिखा है वर्मा मलिक साहब ने (इन्हीं वर्मा मलिक साहब ने शादियों में बजने वाला कालजयी गीत "आज मेरे यार की शादी है" भी लिखा है, इनका दुर्भाग्य यह रहा कि इन्हें अधिकतर "बी" और "सी" ग्रेड की फ़िल्में ही मिलीं जिन्हें फ़िल्मी भाषा में "सुपरहिट" कहा जाता है, वैसी नहीं), गीत को धुनों में बाँधा है कल्याणजी-आनन्दजी ने, फ़िल्म है "हम तुम और वो" (१९७१) तथा गीत को बडे़ मजे लेकर गाया है किशोर दा ने । फ़िल्म में यह गीत फ़िल्माया गया है विनोद खन्ना और भारती पर (दक्षिण की हीरोइन - कुंवारा बाप, मस्ताना, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण आदि हिन्दी फ़िल्मों में ये दिखाई दी हैं) । मुझे हमेशा लगता है कि यह गीत वर्मा मलिक ने काफ़ी पहले लिख लिया होगा एक कविता के रूप में, लेकिन फ़िल्म की सिचुएशन को देखते हुए शायद कल्याणजी भाई को गीत के रूप में दिया होगा... फ़िल्म में विनोद खन्ना हिन्दी अध्यापक के रोल में भारती से प्रणय निवेदन करते हैं, इसलिये इस गीत को थोडा़ मजाहिया अन्दाज में फ़िल्माया गया है, बीच-बीच में कल्याणजी-आनन्दजी ने जो "बीट्स" दिये हैं, वे दक्षिण के "मृदंगम" का अहसास कराते हैं, लेकिन यदि हम शब्दों पर गौर करें तो पाते हैं कि यह तो एक विलक्षण कविता है.. जिसे गीत का रूप दिया गया है... कई शब्द ऐसे हैं जो अब लगभग सुनाई देना तो दूर "दिखाई" देना भी बन्द हो गये हैं, जैसे चक्षु (आँखें), कुंतल (बालों की लट), श्यामल (काला), अधर (होंठ), भ्रमर (भंवरा), याचक (माँगने वाला), व्यथित (परेशान)... तात्पर्य यह कि कोई-कोई उम्दा शब्दों वाला गीत कई बार अनदेखा रह जाता है...या फ़िल्म में उसके चित्रीकरण से उस गीत के बारे में विशेष धारणा बन जाती है, या फ़िर फ़िल्म के पिट जाने पर लगभग गुमनामी में खो जाते हैं, ऐसे कई गीत हैं...
बहरहाल पहले आप गीत (या कविता) पढिये, इसका तीसरा अन्तरा अधिकतर सुनने में नहीं आता, और मैं भी प्रयास करके दो ही अन्तरे आपको सुनवा सकूँगा..

प्रिये... प्रिये...
प्रिये प्राणेश्वरी.. हृदयेश्वरी, यदि आप हमें आदेश करें तो
प्रेम का हम श्रीगणेश करें... यदि आप हमें आदेश करें तो
प्रेम का हम श्रीगणेश करें...
(१) ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल, ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल
ये कुंतल भी श्यामल-श्यामल...
ये अधर धरे जीवन ज्वाला, ये रूप चन्द्र शीतल-शीतल
ओ कामिनी... ओ कामिनी मन में प्रवेश करें
यदि आप आदेश करें तो प्रेम का हम श्रीगणेश करें...
(२) हम भ्रमर नहीं इस यौवन के
हम याचक हैं मन उपवन के..
हम भाव पुष्प कर दें अर्पण
स्वीकार करो सपने मन के...
मन मोहिनी... मन मोहिनी, मन में प्रवेश करें...
यदि आप हमें आदेश करें ...
(३) हों संचित पुण्यों की आशा
सुन व्यथित हृदय की मृदुभाषा
सर्वस्व समर्पण कर दें हम
करो पूर्ण हमारी अभिलाषा..
गज गामिनी... गजगामिनी दूर क्लेश करें..
यदि आप हमें आदेश करें तो प्रेम का श्रीगणेश करें...


नीचे दिये गये विजेट में "प्ले" बटन पर चूहे का चटका लगायें

PriyePraneshwari.m...

Thursday, 19 July, 2007

काँच की बरनी और दो कप चाय - एक बोध कथा

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है, और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी, समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं, छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक-अप करवाओ..टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है..छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे.. अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं ?प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये । अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो..मैंने अभी-अभी यही किया है.. :)

Tuesday, 17 July, 2007

"माँ" पर निबन्ध : माँ से पहचान

राहुल.. होमवर्क हो गया क्या ? चलो जल्दी करो.. स्कूल को देर हो रही है । हो गया मम्मी.. देखो स्कूल में मुझे "मेरी माँ" पर निबन्ध लिखकर ले जाना है, मैने लिखा है - "मेरी माँ मुझे जल्दी उठाती है, होमवर्क करवाती है, पढा़ती है, मुझे कहानियाँ सुनाती है, मुझे डॉक्टर के यहाँ ले जाती है..." चलो,चलो ठीक है, जल्दी से नाश्ता कर लो... बस आती ही होगी । माँ ने राहुल को मदद करके उसे स्कूल भेज दिया । लेकिन शाम को जब राहुल स्कूल से वापस आया तो गुमसुम सा था, निराश सा था । स्कूल में मैडम ने कहा कि जो तुम लोग लिखकर लाये हो, वह तो सभी बच्चों ने थोडे-बहुत फ़ेरबदल के साथ लिखा है, तुम लोगों ने निबन्ध में नया क्या लिखा ? माँ तुम्हारे लिये इतना कुछ करती है, इसलिये वह तुम्हें अच्छी लगती है, लेकिन अपनी माँ के बारे में तुम्हें क्या-क्या मालूम है, वह लिखो... तुम्हारी माँ को क्या पसन्द-नापसन्द है, उसके शौक क्या हैं, उसका जन्मदिन, उसकी मेहनत... इन सब के बारे में तुम्हारे पिताजी को, तुम्हारी दीदी और भैया को क्या लगता है, तुम लोग अपनी माँ के लिये क्या करते हो ? इन सब बातों को देखो, परखो और निरीक्षण करके नया निबन्ध लिखकर लाओ, चाहो तो अपने दीदी, भाई या पिताजी से मदद ले सकते हो... तुम लोग अब आठवीं के बच्चे हो, जरा अपना भी दिमाग लगाओ और फ़िर से निबन्ध लिख कर लाओ..
राहुल के निरीक्षण की शुरुआत हो गई.... माँ की पसन्द-नापसन्द... मैं तो सिर्फ़ आलू की सब्जी खाता हूँ, माँ तो सभी सब्जियाँ, चटनियाँ खाती है, हम सभी को ताजा परोसती है, और यदि किसी दिन कम पड़ जाये तो थोडा़ सा ही खाती है.. बचा हुआ खाना बेकार ना जाये इसलिये कई बार खामख्वाह एक रोटी ज्यादा भी खा लेती है । ताजा और गरम खाना हमें परोसती है, और सुबह का या कल का बासी खुद की थाली में लेती है...अरे.. मैने तो कभी माँ से नहीं कहा कि आज मुझे बासी खाना दे दो, ताजी रोटी तुम खा लो.. मैं ही क्यों, दीदी, भैया और पिताजी ने भी माँ से ऐसा नहीं कहा । मुझे टेबल टेनिस खेलना पसन्द है, इसलिये माँ ने मेरे बर्थ-डे पर बैट लाकर दिया । माँ के शौक क्या हैं ? ... हाँ ठीक.. उसे पत्रिकायें पढना और हारमोनियम बजाना अच्छा लगता है, लेकिन बहुत सालों से हमारा हारमोनियम खराब हो गया है, माँ ने तो सभी से कहा था, लेकिन ना तो भैया, न पापा, किसी ने उस हारमोनियम को ठीक नहीं करवाया... थोडा़ सा समय मिलता है तो माँ कुछ पढने बैठ जाती है, लेकिन एकाध पुस्तक खरीदने की बात चलते ही पापा कहते हैं, पत्रिकायें बहुत महंगी हो गई हैं, इतने में तो दीदी की एक किताब आ जायेगी । अब.. रंग.. रंग.. रंग.. माँ को कौन सा रंग पसन्द है ? पता नहीं, क्योंकि माँ खुद के लिये बहुत ही कम साडियाँ खरीदती है, शादी-ब्याह में जो मिल जाती हैं उसी से काम चलाती है, हाँ, लेकिन बिस्तर की चादरें माँ ने हल्के नीले रंग की ली थीं... निबन्ध में नीला लिख लेता हूँ.. । माँ का जन्मदिन.. कब होता है.. मैडम ने कहा है कि कुछ भी माँ से नहीं पूछना है, दीदी ने बताया - ४ जनवरी... इस दिन हम लोग क्या करते हैं... छिः माँ का जन्मदिन तो हमने कभी ठीक से मनाया ही नहीं.. मेरे, दीदी और पापा के बर्थ-डे पर माँ लौकी का हलवा, गुलाब जामुन और पुरणपोली बनाती है । माँ को कौन सी मिठाई पसन्द है ? मालूम नहीं.. क्यों पापा, माँ को मीठे में क्या पसन्द है ? पापा... पापा... "अरे क्या चाहिये, मैं अखबार पढ रहा हूँ, दिखता नहीं क्या ? माँ से पूछो.. मुझे क्या मालूम !
पिछले हफ़्ते दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक गई थी.. माँ ने सुबह जल्दी उठकर उसके लिये आलू की सब्जी और पूडि़याँ बनाकर दी थीं, पापा ने जो पैसे दिये थे, उसके अलावा अपने पास से पचास रुपये भी दिये... माँ कब पिकनिक पर गई थी ? याद नहीं.. पिछले महीने माँ के महिला मंडल की पिकनिक थी, लेकिन पिताजी ने अपने दोस्तों को खाने पर बुला लिया था और माँ पिकनिक पर नहीं जा पाई । माँ की पढाई के बारे में...मुझे ऐसा याद आ रहा है कि माँ किसी को बता रही थी कि दो मामाओं की पढाई के लिये माँ को कॉलेज बीच में ही छोड़ना पडा़ और उसकी शादी कर दी गई थी । अखबार पढना भी माँ को बहुत पसन्द है, दोपहर में सारे काम निपटाकर माँ अखबार पढती थी, लेकिन दीदी कॉलेज जाने लगी और मैं आठवीं में आ गया तो पिताजी ने हमारी अंग्रेजी सुधारने के लिये हिन्दी अखबार बन्द करके इंग्लिश अखबार लगवा दिया । माँ को टीवी देखना भी अच्छा लगता है, लेकिन रात को पिताजी घर आते ही अंग्रेजी कार्यक्रम और न्यूज लगा देते हैं और मैं दोपहर में कार्टून देखता हूँ, इन सब के बीच माँ को टीवी भी देखने को नहीं मिलता । माँ की सहेलियाँ... एकाध ही हैं महिला मंडल को छोड़कर... मतलब इतने सारे काम करते-करते माँ को सहेलियों के यहाँ जाने का समय ही नहीं मिलता... दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक, फ़िल्में जाती है, मैं शाम को क्रिकेट खेलने जाता हूँ..पिताजी के दोस्त भी हर रविवार को ताश खेलने आ जाते हैं, माँ उनके लिये चाय-नाश्ता बनाती रहती है । माँ को शाम को घूमने जाना अच्छा लगता है, लेकिन पिताजी तो हमेशा रात को देर से घर आते हैं, मैं खेलने में मगन, दीदी और भैया अपने-अपने दोस्तों में, ऐसे में माँ अकेले ही सब्जी खरीदने के बहाने घूमकर आती है, लेकिन उसे वहाँ से भी जल्दी लौटना पडता है, क्योंकि यदि उसे देर हो जाये तो हम "भूख लगी..भूख लगी" करके उसे परेशान कर देते हैं । माँ कभी-कभी क्यों जरा-जरा सी बात पर चिढ जाती है, अब मुझे समझने लगा है ।
मैडम ने निबन्ध लिखने के लिये दस दिन का समय दिया था, राहुल का निरीक्षण जारी था... माँ के कामकाज, उसकी दिनचर्या और दूसरों के साथ उसकी तुलना करते-करते राहुल की धीरे-धीरे अपनी माँ से "पहचान" हो गई थी.. माँ पर निबन्ध लगभग पूरा हो चला था... और अचानक निबन्ध समाप्त करते-करते उसकी कॉपी पर दो बूँद आँसू टपक पडे़ ।
(एक मराठी रचना का अनुवाद, आंशिक फ़ेरबदल व सम्पादन के साथ)

Monday, 16 July, 2007

हिन्दी फ़िल्मों का पहला "रैप" गाना - रेलगाडी...

इसे हिन्दी का पहला "रैप" गाना कहा जा सकता है... यूँ तो अशोक कुमार ने कई फ़िल्मों में कई गाने गाये हैं, बल्कि जब फ़िल्मों में अशोक कुमार का प्रवेश हुआ था तब देविका रानी के साथ उन्होंने कुछ गीत गाये । उस जमाने में हीरो को ही खुद का प्लेबैक देना होता था, जो कि शूटिंग के समय ही रिकॉर्ड कर लिया जाता था, उस परम्परा में के.एल.सहगल, सोहराब मोदी, चन्द्रमोहन आदि कई कलाकार उच्च कोटि के रहे... परन्तु यह गीत जो कि फ़िल्म आशीर्वाद का है, सन १९६८ का है, जब प्लेबैक गायन कोई नई बात नहीं रह गई थी, लेकिन संगीतकार वसन्त देसाई ने इस गाने को अशोक कुमार से ही गवाना उचित समझा... यह गाना यूँ तो एक बालगीत है, लेकिन बेहद तेज गति से गाया गया है, और यह कमाल कर दिखाया है अशोक कुमार ने.. गीत के कई शब्द पकड़ में नहीं आते, लेकिन ध्यान से सुनने पर मजा आ जाता है । इतना जरूर कह सकता हूँ कि "खांडवा-मांडवा" शब्द जरूर अशोक कुमार ने अपने आग्रह पर जोडा़ होगा । पूरे गांगुली परिवार का खंडवा (मप्र) से हमेशा विशेष प्रेम रहा है, यह गीत लिखा है हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने, जिन्होंने इस फ़िल्म में एक महत्वपूर्ण रोल भी किया । हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने फ़िल्म बावर्ची में भी एक अविस्मरणीय रोल किया था और एक गीत में पूरा अन्त्तरा भी गाया था... बहरहाल... इस "रैप" गाने का मजा लीजिये (नीचे दिये गये विजेट में प्ले पर चूहे का चटका लगायें)

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Friday, 13 July, 2007

टेलीमार्केटिंग से बचने के तरीके

आजकल टेलीमार्केटिंग कम्पनियों का जमाना है, रोज-ब-रोज कोई ना कोई बैंक, इंश्योरेंस, फ़ाईनेंस एजेन्सी आदि-आदि फ़ोन कर-कर के आपकी नींद खराब करते रहते हैं, ब्लडप्रेशर बढाते रहते हैं, और आप हैं कि मन-ही-मन कुढते रहते हैं, कभी-कभी फ़ोन करने वाले को गालियाँ भी निकालते हैं, लेकिन अब पेश है कुछ नये आईडिया इन टेलीमार्केटिंग कम्पनियों से प्रभावी बचाव का - इनको आजमा कर देखिये कम से कम चार तो आपको पसन्द आयेंगे ही -

(१) जैसे ही टेलीमार्केटर बोलना बन्द करे, उसे तत्काल शादी का प्रस्ताव दे दीजिये, यदि वह लड़की है तो दोबारा फ़ोन नहीं आयेगा, और यदि वह लड़का है तो शर्तिया नहीं आयेगा ।
(२) टेलीमार्केटर से कहें कि आप फ़िलहाल व्यस्त हैं, तुम्हारा फ़ोन नम्बर, पता, घर-ऑफ़िस का नम्बर दो, मैं अभी वापस कॉल करता हूँ..
(३) उसे, उसी की कही तमाम बातों को दोहराने को कहें, कम से कम चार बार..
(४) उसे कहें कि आप लंच कर रहे हैं, कृपया होल्ड करें, फ़िर फ़ोन को प्लेट के पास रखकर ही चपर-चपर खाते जायें, जब तक कि उधर से फ़ोन ना कट जाये..
(५) उससे कहिये कि मेरी सारे हिसाब-किताब मेरा अकाऊंटेंट देखता है, लीजिये उससे बात कीजिये और अपने सबसे छोटे बच्चे को फ़ोन पकडा़ दीजिये...
(६) उससे कहिये आप ऊँचा सुनते हैं, जरा जोर से बोलिये (ऐसा कम से कम चार बार करें)..
(७) उसका पहला वाक्य सुनते ही जोर से चिल्लाईये - "अरे पोपटलाल, तुम... ! माय गॉड, कितन दिनों बाद फ़ोन किया,,,, और,,,,, और,,,,,, बहुत कुछ लगातार बोलिये... फ़िर वह कहेगा कि मैं पोपटलाल नहीं हूँ, फ़िर भी मत मानिये, कहिये "अरे मजाक छोड़ यार...." । अगली बार फ़ोन आ जाये तो गारंटी...
(८) उससे कहिये कि एकदम धीरे-धीरे बोले, क्योंकि आप सब कुछ हू-ब-हू लिखना चाहते हैं, फ़िर भी यदि वह पीछा ना छोडे, तो एक बार और उसी गति से रिपीट करने को कहें....
(९) यदि ICICI से फ़ोन है तो उसे कहिये कि मेरे ऑफ़िस के नम्बर पर बात करें और उसे HSBC का नम्बर दे दें...