Contradictions in Astrological Methods
“ज्योतिष विज्ञान नहीं, कोरी कल्पना और अनुमान है” लेख में हमने देखा कि किस तरह से विज्ञान के मूल सिद्धांत पर भी ज्योतिष टिकता नहीं है और खामोश बना रहता है, अब उन “कथित” असरकारी तरंगों को देखें -
सबसे पहले याद करें ज्योतिष के मूल सिद्धांत को कि “ग्रह अपना प्रभाव धरती पर डालते हैं”, चलो मान लिया कि दूर आकाश से किसी प्रकार की किरणें मनुष्य के जन्म-स्थान तक पहुँच भी गईं, लेकिन यह समझ में नहीं आता कि वे किरणें धरती के दूसरे हिस्से में जन्म लेने वाले बच्चे तक कैसे पहुँच जाती हैं? (सभी जानते हैं कि धरती गोल है, इसलिये कोई भी ग्रह धरती के उसके सामने वाले हिस्से को ही प्रभावित कर सकता है, जैसे कि चन्द्र या सूर्यग्रहण कहीं-कहीं ही दिखाई देता है)। लेकिन ज्योतिष विज्ञान(?) के अनुसार ग्रहों और नक्षत्रों का असर धरती के उस दूसरे हिस्से पर भी होता है, जो उसके सामने नहीं है। शायद वे यह कहना चाहते हैं कि धरती तो चपटी है थाली की तरह, जिसमें सारी किरणें या जो भी कुछ है, सभी स्थानों पर जन्म लेने वालों पर समान प्रभाव डालेंगे।
(१) इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें – यह किरणें अधिकतर प्रकाश किरणों के रूप में होती हैं, और स्वाभाविक है कि ये किरणें धरती से अंधेरे वाले हिस्से में नहीं पहुँच सकतीं। न ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें धरती को भेदकर दूसरी तरफ़ पहुँच सकती हैं, मतलब ज्योतिष के लिये इन किरणों का कोई मतलब नहीं है।
(२) गुरुत्वाकर्षण – विज्ञान के अनुसार दो पिंडों के बीच की दूरी पर यह बल निर्भर होता है, लेकिन ज्योतिष विज्ञान को गुरुत्वाकर्षण से भी कोई लेना-देना नहीं होता। प्रत्येक ग्रह और धरती की दूरी समयानुसार थोड़ी-बहुत घटती-बढती रहती है, सो उसका असर भी कम-ज्यादा होना चाहिये, लेकिन ज्योतिष इस बात को नहीं मानता।
(३) चुम्बकीय किरणें – इनका प्रभाव एक बहुत ही सीमित हिस्से तक होता है, ये अधिक दूरी तक प्रवास नहीं कर सकतीं। करोड़ों मील दूर किसी ग्रह से चुम्बकीय किरणें यहाँ तक पहुँचना नितांत असम्भव है। इसी प्रकार वैदिक ज्योतिष के “खास” कमाई वाले ग्रह राहु-केतु की उपस्थिति के बारे में अभी तक तो विज्ञान को नहीं पता, कि वे धरती के किस कोण पर, कितनी दूरी पर स्थित हैं, राहु और केतु की तारामंडल में निश्चित स्थिति क्या है? न ही ज्योतिष विज्ञान ने किसी तरह से हमें यह बताने की जहमत उठाई है। क्या राहु-केतु कोई चुम्बकीय प्रभाव डाल सकते हैं? पता नहीं..। मतलब चुम्बकीय प्रभाव वाली “थ्योरी” भी नहीं लागू हो रही... तात्पर्य यह है कि यदि हम मान भी लें कि ग्रहों या नक्षत्रों का कोई प्रभाव होता भी है, तो कृपया बताया जाये कि वह पृथ्वी तक पहुँचता किस प्रणाली से है? स्वाभाविकतः एक सवाल मन में उठता है कि कहीं ये किरणें ग्रहों की बजाय ज्योतिषियों के दिमाग की तरंगें तो नहीं?
इस मोड़ पर आकर तमाम ज्योतिषी दैवी शक्ति, पुराण, पवित्रता, आदि की दुहाई देने लग जाते हैं। वे कुतर्क देने लग जाते हैं कि “ज्योतिष” कोई ऐसा-वैसा या ऐरा-गैरा विषय नहीं है, यह विषय विज्ञान के आगे की चीज है, जहाँ भौतिक विज्ञान समाप्त होता है, वहाँ से ज्योतिष आरम्भ होता है...आदि-आदि, और तारों-ग्रहों-नक्षत्रों का प्रभाव धरती के प्राणियों पर अवश्य पड़ता है। यह प्रभाव रहस्यमयी तरीके से यहाँ तक पहुँचता है। ऊपर दिये गये तर्कों को काटने के लिये कुछ प्रसिद्ध ज्योतिषियों ने इस प्रभाव को दैवीय और गुप्त रूप से उत्पन्न भी बताया है। वे सीधे कह देते हैं कि ग्रहों की स्थितियों के अनुसार पड़ने वाले प्रभावों को वैज्ञानिक तरीके से साबित नहीं किया जा सकता।
इन तर्कों के आधार पर ज्योतिषियों का दोमुँहापन साफ़-साफ़ उजागर हो जाता है, जब हम कहते हैं कि ज्योतिष शास्त्र दैवीय शक्तियों, चमत्कार आदि की बातें करता रहता है तो वे कहते हैं कि नहीं यह एक विज्ञान है, और जब विज्ञान सम्बन्धी उनके तर्क नहीं चलते तो वे गुप्त, रहस्यमयी, पाप-पुण्य, भाग्य आदि की बातें करके कहते हैं कि इसे विज्ञान द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता, अब इसे क्या कहा जाये?
वैदिक ज्योतिष में “दशा-पद्धति” की विसंगतियाँ और उठते प्रश्न –
“ज्योतिष” विज्ञान का मूल सिद्धान्त है “जैसा ऊपर, वैसा ही नीचे” अर्थात जैसा अन्तरिक्ष या सुदूर ब्रह्माण्ड में घटित होगा उसका असर धरती पर पड़ेगा। अर्थात ऐसी उनकी मान्यता होती है, और उसी के अनुसार वे भविष्य में आने वाली घटनाओं की गणना करके “ग्राहक” को बताते हैं। हमें देखना होगा कि जिस “ऊपर” नाम की चीज या “ब्रह्माण्ड” की बातें ये करते हैं और उसी के आधार पर राशियों और जन्म-कुण्डली का निर्धारण करते हैं, दर-असल वहाँ वैज्ञानिक समय पद्धति से क्या-क्या घट रहा है, जिसके आधार पर यहाँ “नीचे” मनुष्यों के भविष्य, भाग्य(?) और दुर्भाग्य(?) का निर्धारण वे सतत् करते रहते हैं। ज्योतिष के मूल सिद्धान्त “दशा-पद्धति” में साफ़-साफ़ असंगत नजर आते हैं। “दशा-पद्धति” सिर्फ़ “मानो या ना मानो” के सिद्धान्त पर काम करती है, इसका ग्रहों या तारों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता, न ही राशियों और जन्म-नक्षत्रों से। अद्भुत तरीके से यह “गणनायें” की जाती हैं और इसमें सिर्फ़ ग्रह का नाम देना ही पर्याप्त होता है, राशि का नाम जरूरी नहीं है। “दशा-पद्धति” ऐसी अनोखी पद्धति है जिसमें तारों और ग्रहों की कोई आवश्यकता नहीं है, सिर्फ़ उनका नाम लेना काफ़ी है।
दशा-पद्धति के आधारभूत तत्व-
इस पद्धति में ग्रह का नाम होता है, एक “प्रॉक्सी” के तौर पर, यह नाम ही उस ग्रह की तमाम “पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी” लेकर चलता है, इसलिये ध्यान दें कि “ग्रह” मतलब सिर्फ़ एक नाम है, असली ग्रह नहीं। यह पद्धति मानकर चलती है हरेक ग्रह का अपना-अपना पूर्वनिर्धारित “स्वभाव” और “प्रभाव” होता है और ये ग्रह उसी के अनुसार मनुष्य पर कुछ वर्षों तक अपना असर डालते हैं, जिसे वे “दशा-काल” कहते हैं। ग्रहों के नाम और स्थान मनमाने तरीके से संयोजित किये हुए प्रतीत होते हैं, क्योंकि ये ग्रह उसी निर्धारित क्रम पर चलते हैं। वे एक के बाद एक आते हैं और मनुष्य के जीवन पर अपने निर्धारित वर्षों तक प्रभाव डालते हैं, फ़िर अगला ग्रह दूसरे ग्रह से “चार्ज” ग्रहण करता है और यह प्रक्रिया चलती रहती है। १२० वर्षों की दशा को “विंशोत्तरी” कहा जाता है जिसमें ग्रहों का क्रम इस प्रकार है – केतु (एक काल्पनिक ग्रह), शुक्र (Venus), सूर्य (Sun), चन्द्र (Moon), मंगल (Mars), राहु (काल्पनिक), गुरु (Jupiter), शनि (Saturn) और बुध (Merquery). इन ग्रहों का दशा-काल (प्रभाव समय) इस प्रकार मान लिया गया है – 7, 20, 6, 10, 7, 18, 16, 19, और 17 कुल मिलाकर 120 वर्ष। जबकि 108 वर्षों के दशा-काल, जिसे “अष्टोत्तरी” कहा जाता है, इसमें ‘केतु’ को निकाल दिया गया है। इस काल में शुक्र से मंगल तक तो क्रम वही है, लेकिन बाकी के चार ग्रहों को उलटे क्रम में लगा दिया जाता है, पता नहीं क्यों (जाहिर है कि ज्योतिष के विद्वान मेरे जैसे अज्ञानी और अधर्मी को इस बात का भी जवाब देंगे)। निश्चित तौर पर इन सबका कोई ठोस कारण नहीं नजर आता। जब राहु और केतु दोनों काल्पनिक ग्रह हैं फ़िर राहु का दशा काल 18 वर्ष और केतु का 7 वर्ष क्यों? दशा पद्धति का सम्बन्ध हमारे जीवन पर ऐसा माना गया है – बच्चे का जन्म नक्षत्र (Zodiac Birth) कुण्डली के आधार पर तय किया जाता है, इस जन्म-नक्षत्र का एक ‘स्वामी’ (Boss) या भगवान होता है। जब इसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है तब अगल ग्रह आकर उसका स्थान ले लेता है और यह क्रम सम्पूर्ण जीवन तक चलता रहता है।
कुछ ज्योतिषी और पुराने लोग तो यह दावे भी करते रहते हैं कि – “कुछ प्राचीन ऋषियों ने हजारों साल पहले ताड़पत्रों पर समूची मानव जाति का भविष्य लिख दिया था”, “उन ऋषियों ने तो सारे अनुमान और जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य का भूत-भविष्य पहले ही देख लिया था”, “उन ताड़पत्रों को सिर्फ़ विशेषज्ञ लोग ही पढ़ सकते हैं क्योंकि वे एक विशिष्ट भाषा में लिखे हुए हैं”, तात्पर्य यह कि सब कुछ रहस्यमयी, मनमाना, अगणितीय, अवैज्ञानिक है। यदि नहीं, तो महान लोग बताने का कष्ट करें कि- एक ही स्थान और एक ही समय पर, यहाँ तक कि लगभग एक ही पारिवारिक पृष्ठभूमि रखने वाले दो बच्चों (यहाँ तक कि जुड़वाँ बच्चों) के कर्म, उनके भविष्य, उनकी नौकरी/व्यवसाय, उनकी शादी, उनके बच्चे, उनकी मृत्यु के बीच समानता क्यों नहीं होती? क्यों सुनामी में मारे गये लाखों लोगों की कुण्डली एक जैसी नहीं थी?
जब विज्ञान कहता है कि H2 और O को मिलाकर पानी बनता है तो वह पानी साइबेरिया में भी बनता है और ऑस्ट्रेलिया में भी बनता है। विज्ञान कभी भी यह नहीं कहता कि अब हम यह टेलीफ़ोन चालू कर रहे हैं, यदि आपका “कर्म” अच्छा होगा तो यह चलेगा, नहीं तो नहीं चलेगा। विज्ञान ने यह भी कभी नहीं कहा कि हम यह मोटर चालू कर रहे हैं, यदि आपका “भाग्य” साथ देता रहा तो यह चलती रहेगी, हो सकता है कि न भी चले, यह भी हो सकता है कि आपके पूर्वजन्म के कारण यह मोटर जल जाये। लेकिन ज्योतिषियों के पास इस बाबत् तमाम कुतर्क होते हैं, और भोला भगत इस बात पर विश्वास कर लेता है कि “पंडित” जी ने तो भविष्य एकदम सही बताया था, लेकिन क्या करें “भाग्य में यही लिखा था”, “जो होना है वह होकर ही रहता है”, “हो सकता है कि हमारे कर्मों में कोई खोट हो” आदि-आदि। मतलब ज्योतिषी महोदय माल अंटी करके भी साफ़ बरी।
हाल ही में तमिलनाडु में एक व्यक्ति ने कोर्ट में धोखाधड़ी का मुकदमा दायर किया था जिसमें ज्योतिषी महोदय एक मृत व्यक्ति की कुण्डली देखकर उसके उज्जवल भविष्य और चमकदार कैरियर की भविष्यवाणियाँ करते पकड़े गये थे। जब कुण्डली देखकर वे यह भी नहीं बता सकते कि मौत हो चुकी है तब वे विवाह, गृहप्रवेश, परीक्षा में पास/फ़ेल होने जैसी बातों के बारे में एकदम सही कैसे बता सकते हैं। एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल (जो कि ज्योतिष, ज्योतिषियों, पंडों और पुजारियों के लिये मशहूर है) के एक प्रसिद्ध ज्योतिषी की लड़की ने घर से भागकर एक दूसरे धर्म के लड़के से शादी कर ली, ज्योतिषी महाशय को पता ही नहीं चल सका। दूसरे एक और महान ज्योतिषी ने अपनी लड़की की पचासों कुंडलियाँ मिलाकर, तमाम ठोक-बजाकर उसकी शादी की लेकिन “जमाईराजा” दारुकुट्टे और जुआरी निकले, उनकी लड़की को आत्महत्या करनी पड़ी, ऐसा क्यों? यदि वे पचास कुंडलियाँ देखकर भी अपने लिये एक सही दामाद नहीं ढूँढ सकते तो फ़िर उन्हें ज़माने को ‘ज्ञान’ बाँटने का क्या हक है? इसलिये इसे विज्ञान कहना तो कम से कम बन्द किया जाये, हाँ, यह जरूर कहा जा सकता है कि यह सिर्फ़ एक अनुमान है, जिसके सही या गलत होने की पूरी सम्भावना है, और यही तो हम कह रहे हैं... दिक्कत यह है कि “खगोल विज्ञान” का विस्तार करके स्वार्थी तत्वों ने उसे “ज्योतिष विज्ञान” बना दिया है।
दुनिया के बड़े-बड़े और विद्वान ज्योतिषी सेमिनार करें, गोष्ठियाँ करें, सभायें करें, कुछ उपकरणों की मदद लें और सभी मिलकर बतायें कि फ़लाँ लड़की की कुण्डली में भयानक सा “मंगल” बैठा हुआ है, अव्वल तो इसकी शादी होगी ही नहीं या यदि किसी ने इससे शादी की तो उसकी इतने-इतने समय में मृत्यु हो जायेगी, और वाकई में वैसा ही हो तब तो इसे विज्ञान माना जायेगा... और ऐसा एक कुंडली में नहीं बल्कि सर्वमान्य रूप से एक जैसी कुण्डलियों में होना चाहिये, यही तो विज्ञान का सिद्धान्त है कि जो एक जगह और एक व्यक्ति के लिये लागू है वही सभी के लिये लागू होगा। लेकिन नहीं, जहाँ आपने तर्क-वितर्क करने की कोशिश की, तत्काल आप अधर्मी, नालायक, बड़बोले आदि घोषित कर दिये जाते हैं, ताकि सच्चाई (जो अभी साबित होना बाकी है) सामने न आ सके, धन्धा-पानी बदस्तूर जारी रहे।
हाल ही में हरियाणा के रोहतक में एक डॉक्टर दंपति ने तथाकथित तन्त्र-मंत्र के चक्कर में अपने एक बेटे की बलि चढ़ा दी, यह निश्चित तौर पर झकझोरने वाली और समर्थ सोच रखने वाले लोगों के लिये वाकई चिन्ता की बात है। एक पढ़े-लिखे पति-पत्नी भी जब तंत्र-मंत्र के चक्कर में इस हद तक गिर जाते हैं तो बेचारे अनपढ़ और गाँव वाले लोगों को क्या दोष दिया जा सकता है? तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, ज्योतिष-कुण्डली, धर्म-कर्म, भाग्य, अंधविश्वास आदि से हमारा समाज इतना प्रभावित है कि उच्च और वैज्ञानिक शिक्षा भी उसे “बाबागिरी”, “कर्मकाण्ड” आदि कुचक्रों से बाहर नहीं निकाल पा रही है।
ज्योतिषी जरा नील आर्मस्ट्रॉंग की कुंडली देखकर बतायें कि उस पर चन्द्रमा का कितना असर हुआ? और सुनीता विलियम्स की कुंडली भी देखें कि लगभग दो सौ दिन पृथ्वी से दूर रहने से मंगल का कितना प्रभाव उस पर कम-ज्यादा हुआ, क्योंकि पृथ्वी के चक्कर लगाने के दौरान सुनीता की दूरी रोज-ब-रोज मंगल और चन्द्रमा से घटती-बढ़ती रही थी? फ़िर वैज्ञानिक आँकड़ों के साथ विश्व के सामने आयें और बतायें। वरना यूँ ही ज्योतिष को ‘विज्ञान’ कह देने भर से विज्ञान मान लेना भी एक अज्ञानता होगी।
अधर्मी, विधर्मी, नालायक, बड़बोला, अज्ञानी, बेवकूफ़ आदि शब्दों को अग्रिम में ग्रहण करते हुए वैज्ञानिक और गणितीय तर्कों के इन्तजार में हूँ..... ताकि उनका भी सकारात्मक जवाब दिया जा सके। अगले भाग में कुछ और तार्किक प्रश्न होंगे, जाहिर है कि मुझमें अक्ल की कमी है...
(लेख में सन्दर्भ – महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के साहित्य से)
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