Tuesday, 26 February, 2008

अमीरी के साथ-साथ बेशर्मी, ढिठाई और असामाजिकता बढ़ती जाती है?

Rich People Uncivilized Unsocial Selfish

पहला दृश्य देखिये – पंजाब के खन्ना गाँव के अनपढ़ ग्रामीणों ने कैसा व्यवहार किया। लुधियाना से 50 किमी दूर रात के 3 बजे, खून जमा देने वाली ठंड के बीच एक रेल दुर्घटना हुई। गाँव के सारे लोग एक घंटे के भीतर इकठ्ठा हो चुके थे, गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर से सबको जगा-जगाकर दुर्घटनास्थल भेजा जा रहा था, जिसके पास ट्रैक्टर थे उन्होंने अपने ट्रैक्टर रेल्वे लाइन के आसपास हेडलाइट जलाकर चालू हालत में छोड़ दिये ताकि वहाँ रोशनी हो सके। रेल के डिब्बों से लाशों से निकालने का काम शुरु कर दिया गया। गाँव की औरतों ने लालटेन जलाकर और खेत से फ़ूस में आग लगाकर ठंड से काँप रहे घायलों को थोड़ी गर्मी देने की कोशिश की।

जल्दी ही सैकड़ों की संख्या में आरएसएस के कार्यकर्ता वहाँ पहुँच गये, किसी भी सरकारी मदद के बिना उन्होंने गुरुद्वारे में ही एक “टेम्परेरी” अस्पताल खोल दिया और रक्तदान शुरु कर दिया। गाँव वालों ने एक समिति बनाई जिसने अगले एक सप्ताह तक घायलों और मृतकों के रिश्तेदारों और बाहर से आने वाले लगभग 30000 लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था की। जिन्दा या मुर्दा किसी की जेब से एक रुपया भी चोरी नहीं हुआ, समिति के अध्यक्ष ने मृतकों की ज्वेलरी और लाखों रुपये कलेक्टर को सौंपे, जब मृतकों के रिश्तेदार भी उन छिन्न-भिन्न लाशों के पास जाने से घबरा रहे थे, तब आरएसएस के युवकों ने उनका सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार किया।

अब दूसरा दृश्य देखिये - वह 26 जनवरी 2001 की शाम थी, गुजरात में आये महाविनाशकारी भूकम्प की खबरें तब तक पूरे देश में फ़ैल चुकी थीं। लाशों के मिलने का सिलसिला जारी था और धीरे-धीरे भूकम्प की भयावहता सभी के दिमाग पर हावी होने लगी थी। लेकिन दिल्ली, जो कि देश की राजधानी है, उसके एक केन्द्रीय इलाके में चारों तरफ़ रोशनी थी, धूमधड़ाका था, मौज मस्ती चल रही थी। जब समूचा देश शोक और पीड़ा में डूबा हुआ था, वहाँ एक विशाल पार्टी चल रही थी। उस पार्टी में भारत के जाने-माने रईस, समाज के बड़े-बड़े ठेकेदार तो थे ही, वर्तमान और भूतपूर्व फ़िल्म स्टार, दागी क्रिकेटर, उद्योगपति, गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी, नौकरशाह, बैंक अफ़सर, पत्रकार और यहाँ तक कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले बड़े शिक्षाविद भी थे। एक बड़े कम्युनिस्ट नेता भी उस पार्टी की शोभा बढ़ा रहे थे। पार्टी का मुख्य आकर्षण था एक भव्य स्टेज जहाँ एक मुख्यमंत्री बेकाबू होकर खुद गाने-बजाने लग पड़े थे, और उनके जवान बेटे को उन्हें यह कह कर शांत करना पड़ा कि गुजरात में आज ही एक राष्ट्रीय आपदा आई है और इस तरह आपका प्रदर्शन शोभा नहीं देता।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह पार्टी थी किस उपलक्ष्य में? यह पार्टी एक 45 साल के बच्चे के जन्मदिन के उपलक्ष्य में थी। यह पैंतालीस साला बच्चा और कोई नहीं बल्कि एक ख्यात व्यवसायी, उद्योगपति, फ़िल्मी (खासकर हीरोईनों) और क्रिकेट हस्तियों से विशेष मेलजोल रखने वाला, और एक ऐसी पार्टी का मुख्य कर्ता-धर्ता था, जो अपने नाम के आगे “समाजवादी” लगाती है… (क्या अब नाम भी बताना पड़ेगा)। उस पार्टी में शामिल होने के लिये मुम्बई से कुछ लोग चार्टर विमान करके आये थे। यह पार्टी सिर्फ़ 26 जनवरी की रात को ही खत्म नहीं हुई, बल्कि यह 27 जनवरी को भी जारी रही, जबकि यह सभी को पता चल चुका था कि भुज-अंजार में लगभग 15000 लोग मारे गये हैं और तीन लाख से अधिक बेघर हुए हैं। 27 जनवरी की पार्टी उन लोगों के लिये थी, जो 26 जनवरी को उसमें शामिल होने से चूक गये थे। 27 जनवरी तक हालांकि तमाम राजनीतिक लोग इस पार्टी से शर्मा-शर्मी में दूर हो गये थे सिर्फ़ इसलिये कि कहीं वे मीडिया की नजर में न आ जायें, लेकिन दिल्ली और मुम्बई के कुछ प्रसिद्ध अमीर, समाज के प्रमुख स्तम्भ माने जाने वाले लोग इतने बेशर्म और ढीठ थे कि उन्होंने पार्टी स्थगित करना भी उचित नहीं समझा।

और ऐसा करने वाले अकेले दिल्ली के अमीर ही नहीं थे, मुम्बई में भी 26 जनवरी की रात को ही एक फ़ैशन शो आयोजित हुआ (जिसमें जाहिर है कि “एलीट” वर्ग ही आता है)। भविष्य की मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स चुनने के लिये यह शो आयोजित किया गया था। हमेशा की तरह विशिष्ट लोगों ने “माँस” की वह प्रदर्शनी सूट-बूट पहनकर देखी, मीडिया ने भी सुबह गुजरात में लाशों और टूटे घरों की तथा शाम को अधनंगी लड़कियों की तस्वीरें खींची और अपना कर्तव्य निभाया।

लेकिन हमारे-आपके और देश के दुर्भाग्य से दिल्ली के एक छोटे से सांध्य दैनिक के अलावा किसी राष्ट्रीय अखबार ने पंजाब के गाँववालों की इस समाजसेवा के लिये (आरएसएस की तो छोड़िये ही) तारीफ़ में कुछ नहीं छापा। कल्पना कीजिये कि यदि कोई एकाध-दो गुण्डे दो-चार यात्रियों के पैसे या चेन वगैरह लूट लेते तो “आज तक” जैसे नकली चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज क्या होती? “दुर्घटनाग्रस्त यात्रियों से लूटपाट…”, बड़े अखबारों में सम्पादकीय लिखे जाते कि कैसे यह पुलिस की असफ़लता है और कैसे गाँव वालों ने लूटपाट की।

समाज के एक तथाकथित “एलीट” वर्ग ने गाँव वालों को हमेशा “गँवई”, “अनसिविलाइज्ड” कहा और प्रचारित किया है। जबकि हकीकत यह है कि जैसे-जैसे अमीरी बढ़ती जाती है, “मैं”, “मेरा परिवार”, “मेरा पैसा”, “मेरी सुविधायें” वाली मानसिकता बढ़ती जाती है। जब समाज को कुछ योगदान देने की बात आती है तो अमीर सोचता है कि मेरा काम सिर्फ़ “पैसा” देना भर है, और पैसा भी कौन सा? जो उसने शोषण, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, साँठगाँठ करके कमाया हुआ है। त्याग, बलिदान, समाजसेवा की बारी आयेगी तो ग्रामीण खुद-ब-खुद आगे आता है…

याद कीजिये कंधार का हवाई अपहरण कांड, कैसे अमीर लोग टीवी कैमरों के सामने अपना “छातीकूट” अभियान लगातार जारी रखे रहे, इक्का-दुक्का को छोड़कर एक भी अमीर यह कहने के लिये आगे नहीं आया, कि “सरकार एक भी आतंकवादी को न छोड़े चाहे मेरे परिजन मारे ही क्यों न जायें…” लेकिन यही अमीर वर्ग सबसे पहले करों में छूट की माँग करता है, सरकार को चूना लगाने के नये-नये तरीके ढूँढता है, बिजली चोरी करता है और बाकी सारे धतकरम भी करता है, यहाँ तक कि हवाई दुर्घटना में मरने पर दस लाख का हर्जाना और बस दुर्घटना में मरने पर एक लाख भी नहीं (यानी मौत में भी भेदभाव), ढिठाई तो इतनी कि सरेआम फ़ुटपाथ पर लोगों को कुचलने के बावजूद मुम्बई में सलमान और दिल्ली में संजीव नन्दा साफ़ बच निकलते हैं, लेकिन आलोचना की जाती है ग्रामीण वर्ग की… क्या खूब दोगलापन है।

कोई यह नहीं चाहता कि अमीरों को नुकसान पहुँचाया जाये, लेकिन कम से कम उन्हें दूसरों की तकलीफ़ों और दुःखों की समझ होनी चाहिये। कोई यह नहीं कह रहा कि वे आगे आकर अन्जान लोगों की लाशों को दफ़नायें/जलायें (वे कर भी नहीं सकते) लेकिन कम से कम जो लोग ये काम कर रहे हैं उनकी तारीफ़ तो कर सकते हैं। कोई उनसे यह नहीं कह रहा कि गुजरात या लुधियाना जाकर मृतकों/घायलों की मदद करो, लेकिन कम से कम बेशर्मी भरी पार्टियाँ तो आयोजित न करें।

माना कि जीवन चलने का नाम है और दुर्घटनाओं से देश रुक नहीं जाता, लेकिन सार्वजनिक रूप से इस प्रकार का भौंडा प्रदर्शन निहायत ही घटिया और शर्मनाक होता है। गाँवों में आज भी कोई बड़ी दुर्घटना होने पर शादी-ब्याह तक रोक दिये जाते हैं, लेकिन अमीरो को कम से कम यह खयाल तो करना ही चाहिये कि पड़ोस में लाश पड़ी हो तो दीवाली नहीं मनाया करते। ऐसे में रह-रह कर सवाल उठता है कि क्या अमीरी के साथ बेशर्मी, ढिठाई, असामाजिकता और स्वार्थीपन भी बढ़ता जाता है?

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9 comments:

भुवनेश शर्मा said...

बहुत सही मुद्दा उठाया आपने.

पेज थ्री फिल्‍म का एक दृश्‍य याद आ रहा है जिसमें शहर में बम विस्‍फोट हो जाने के बाद एक पार्टी में मुंबई का पुलिस कमिश्‍नर बेशर्मी से कहता है- मुंबई रुकती नहीं दैट्स द स्पिरिट आफ मुबई। तब कोंकना सेन बताती है कि आपको यदि शहर की स्पिरिट ही देखना थी तो उन लोगों को देखना चाहिए था जो दूसरों की मदद कर रहे थे न कि जो कुछ भी हो जाने के बाद पार्टी मना रहे हैं।

यदि न देखी हो तो जरूर देखिए बहुत अच्‍छी फिल्‍म है।

Mired Mirage said...

मैं आपके बताए अमीरों के बारे में नहीं जानती परन्तु भूकम्प के समय मैं गुजरात में ही थी । यहाँ अमीरों, गरीबों किसी ने भी सहायता में कोई कमी नहीं रखी । मेरे विचार से अच्छे बुरे, संवेदनशील व असंवेदनशील सभी वर्गों में पाए जाते हैं । खन्ना के ग्रामीणों को मेरा नमन । वैसे भी पंजाब में सहायता की यह परम्परा सदा से रही है । गुरुद्वारों की भी । आर एस एस के विषय में भी यह सुनती रही हूँ ।
घुघूती बासूती

हिन्दु चेतना said...

अच्छा लेख है सिर्फ आप ही लिख सकते हो।

मुनादीवाला said...

आपका नया खुलाचिट्ठा कोई मेंबरशिप नहीं
यहॉं सब एकदम खुला...भड़ास क्‍या जो चाहे निकालो। कोई मेंबर ऊंबर नहीं बनना कोई झंझट नहीं। अरे कोई पार्टी खोले हैं कि एमपी बनना है। चैनलहू नहीं खोलना। तो काहे मेंबरशिप। जो यार लिखना चाहे सीधे khulachittha.post@blogger.com पर मेल करदे। पोस्‍ट सीधे अपने आप छप जाएगी, हमारे पास नहीं आएगी सीधे ब्‍लॉग पर जाएगी। डायरेक्‍ट आपही मालिक हर लिखे के, कोई झंझट नहीं कोई गिनती नहीं कि आज इतने हो गए आज उतने। तो फिकर काहे की, हो जाओ शुरू।
http://khulachittha.blogspot.com/

संजय बेंगाणी said...

बाड़ के समय और भूकम्प के समय सभी लोग सहायता के लिए आगे आये थे.

बाकि तो जो आपने लिखा है, सही है.

mahashakti said...

आपका यह लेख सच्‍चाई से परिपूर्ण है, कि आज देश में हर प्रकार के लोग है अमीर भी गरीब भी, इन्‍ही अमीरों में कुछ राजनेता है जो जनता को केवल अपना चुनाव के समय ही मानती है।

आज की मीडिया साधु‍ सन्‍यासी, मन्दिर मठ, तथा संघ जैसे समाजिक संगठन की कमियों को बनाने में समय जाया करते है किन्तु उन्‍हे कभी यह नही दिखता कि वास्‍तविकता क्‍या है? अगर मीडिया और राजनेता दो धुरी ठीक हो जाये तो‍ भारत के विकास को कोई नही रोक सकता है।

anitakumar said...

एकदम सही कहा है आप ने , बहुत बड़िया लिखा है

अरुण said...

सुरेश जी आप तो बस आप ही है.कमाल का लेखन है आपका ,और मुद्दे तो आपके पास इतने है गिनती मे नही आ सकते इन बातो को लगातार उठाकर शायद आप कुछ लोगो की मानसिकता को तो झझकोर ही सकते है..

अजित वडनेरकर said...

सुरेशजी , दाद देता हूं आपके दृष्टिकोण की और मुद्दों को पकड़ने की कौशल की। एकदम सही लिखा है।