अमेरिकी फ़ंडा : ॠण लेकर घी पियो, अर्थव्यवस्था मजबूत होगी…
American Sub Prime Crisis Indian Economy
जी, मैं कोई मजाक नहीं कर रहा। हालांकि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ, लेकिन “अमेरिकी रिसेशन” (बाजारों की मंदी) नाम का भूत जब सारी दुनिया को डराता हुआ घूम रहा है, उसके पीछे यही चार्वाक नीति काम कर रही है। अमेरिकी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने ज्यादा कमाई और ब्याज के लालच में ऐसे-ऐसे लोगों को भी ॠण बाँट दिये जिनकी औकात उतनी थी नहीं, यही है अमेरिकी सब-प्राइम संकट, सरल भाषा में। मंदी छाई हुई है अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर, लेकिन घिग्घी बंधी हुई है हमारी और हमारे शेयर बाजारों की। ऐसा क्यों होता है?
“बचत करना पाप है, खर्च करना गुण है…” एक महान अर्थशास्त्री का यह बयान अमेरिका पर कितना सटीक बैठता है, आइये देखते हैं। आमतौर पर मान्यता है कि जापानी व्यक्ति बेहद कंजूस होता है और बचत में अधिक विश्वास करता है। जापानी अधिक खर्च नहीं करते, जापान की वार्षिक बचत लगभग सौ अरब है, फ़िर भी जापानी अर्थव्यवस्था कमजोर मानी जाती है। दूसरी ओर अमेरिकी खर्चते ज्यादा हैं, बचाते कम हैं, यहाँ तक कि अमेरिका निर्यात से अधिक आयात करता है, उसका व्यापार घाटा चार सौ अरब को पार कर चुका है। फ़िर भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत मानी जाती है और सारी दुनिया उसकी सेहत के लिये फ़िक्रमन्द रहती है।
अब सवाल उठता है कि अमेरिकी लोग खर्च करने के लिये इतना पैसा लाते कहाँ से हैं? असल में वे उधार लेते हैं, जापान से, चीन से, भारत से और भी वहाँ से जहाँ के लोग बचत करते हैं। बाकी सारे देश बचत करते हैं, ताकि अमेरिका उसे खर्च कर सके, क्योंकि लगभग सारे देश अपनी बचत डॉलर या सोने में करते हैं। अकेले भारत ने ही अपनी विदेशी मुद्रा को लगभग 50 अरब डालर की अमेरिकी प्रतिभूतियों में सुरक्षित रखा हुआ है, चीन का आँकड़ा 160 अरब डॉलर का है। अमेरिका ने पूरे विश्व से पाँच खरब डॉलर लिये हुए हैं, इसलिये जैसे-जैसे बाकी का विश्व बचत करता जाता है, अमेरिकी उतनी ही उन्मुक्तता से खर्च करते जाते हैं। चीन ने जितना अमेरिका में निवेश किया हुआ है उसका आधा भी अमेरिका ने चीन में नहीं किया, यही बात भारत के साथ भी है, हमने अमेरिका में लगभग 50 अरब डॉलर निवेश किया है, जबकि अमेरिका ने भारत में 20 अरब डॉलर।
फ़िर सारी दुनिया अमेरिका के पीछे क्यों भाग रही है? इसका रहस्य है अमेरिकियों की खर्च करने की प्रवृत्ति। वे लोग अपने क्रेडिट कार्डों से भी बेतहाशा खर्च करते हैं, जो कि उनकी भविष्य की आमदनी है, इसीलिये अमेरिका निर्यात कम करता है, आयात अधिक करता है, नतीजा – सारा विश्व अपने विकास के लिये अमेरिका के खर्चों पर निर्भर होता है। यह ठीक इस प्रकार है कि जैसे कोई दुकानदार किसी ग्राहक को उधार देता रहता है ताकि वह उसका ग्राहक बना रहे, क्योंकि यदि ग्राहक खरीदना बन्द कर देगा तो दुकानदार का धंधा कैसे चलेगा? इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है और उधारी बढ़ती जाती है, इसमें ग्राहक तो उपभोग करके मजे लूटता रहता है, लेकिन दुकानदार उसके लिये मेहनत करता जाता है।
अमेरिकियों के लिये सबसे बड़ा दुकानदार है जापान। जब तक जापानी खर्च करना प्रारम्भ नहीं करते वे विकास नहीं कर सकते। जापान सरकार ने बचतों पर भी टैक्स लगाना शुरु कर दिया है, लेकिन फ़िर भी वहाँ सिर्फ़ पोस्ट ऑफ़िसों की बचत लगभग एक खरब डॉलर है, यानी भारत की अर्थव्यवस्था का तीन गुना।
सभी प्रमुख अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि जब तक किसी देश के लोग खर्च करना प्रारम्भ नहीं करते, देश तरक्की नहीं कर सकता, और सिर्फ़ खर्च नहीं करना है, बल्कि उधार ले-लेकर खर्च करना है। अमेरिका में बसे भारतीय अर्थशास्त्री डॉ जगदीश भगवती ने एक बार मनमोहन सिंह से कहा था कि भारतीय लोग खामख्वाह बचत करते हैं, भारत के लोगों को विदेशी कारों, मोबाइल, परफ़्यूम, कॉस्मेटिक्स पर खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ानी होगी, इससे भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी। सरकार ने इस दिशा में काम करते हुए पिछले एक दशक में जमा पूँजी पर ब्याज दरों को क्रमशः कम किया है, और वह दिन दूर नहीं जब आपकी जमापूँजी सुरक्षित रखने के लिये बैंके उलटे आपसे पैसा लेने लगेंगी। सरकार चाहती है कि हर भारतीय खर्चा करता रहे, अपना पैसा शेयर मार्केट में लगाकर सटोरिया बन जाये। ईपीएफ़ के पैसों को भी बाजार में झोंकने की पूरी तैयारी है।
अब आप सोच रहे होंगे कि दुकानदार-ग्राहक वाली थ्योरी कैसे काम करेगी, क्योंकि जब कर्जा लिया है तो कुछ तो लौटाना ही होगा, यह तो हो नहीं सकता कि दुकानदार देता ही रहे। होता यह है कि जब अमेरिका को किसी देश का कर्ज उतारना होता है तो वह उसे हथियार बेचता है, बम बेचता है, F-16 हवाई जहाज बेचता है, दो बेवकूफ़ देशों को आपस में लड़वाकर पहले तो दोनों को हथियार बेचता है, फ़िर एक पर कब्जा करके उसका तेल अंटी करता है, ताकि अमेरिकियों की कारें लगातार चलती रहें… अंकल सैम की खुशहाली का यही राज है “जमकर खर्च करो…”। बचत करने के लिये और आपस में लड़कर उनका हथियारों का धंधा जारी रखने के लिये दुनिया में कई मूर्ख मौजूद हैं…
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8 comments:
भाइ कुछ उधार देते हो क्या ,मै भी एक जीतू भाई जैसी गाडी लेने की सौच रहा हू..:) इस गरीब की भी होली मन जायेगी जी
फिक्की की रिटेल रिपोर्ट कहती है कि भारतीय खर्चीले नहीं होते इसलिए अगर रिटेल व्यवसाय को सफल बनाना है तो यहां कर्ज लेकर खर्च करने का माहौल बनाना होगा. अरबों रूपये इसके लिए खर्च करने की योजना है कि भारतीय अपना स्वभाव बदलें.
अच्छा लेख.
आपने सटीक जानकारी दी है और अक्षरक्ष: सत्य है. ऐसे ही लिखते रहिये.
दीपक भारतदीप
हमरी अंटी में तो कुछ है ही नहीं. कोई यहां उधार दे रहा है क्या ?
बढि़या लेख. सबप्राइम संकट के बारे में ऐसी सरल भाषा में लिखा जाए तो जल्दी समझ में आता है हम जैसे अकल के मंदों को.
सुरेश जी ये तो कुछ भी नहीं, ज़रा सोचिये, जब ये ताश का महल ढहेगा तो कैसी कयामत आयेगी. इनके सब-प्राइम क्राइसिस ने वहां रिसेशन ला दिया, इसको देखकर आधे देश तो डालर से वैसे ही बिदक कर यूरो की तरफ खिंच रहे हैं.
भई ये अमेरिकी फंडा कब से हो गया ये तो चार्वाक के जमाने से अपन भारतीयों का ही फंडा है न ;)
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