Saturday, 29 March, 2008

जीवित व्यक्तियों पर डाक टिकट? क्या बकवास है…

Indian Postal Stamps on Celebrities
केन्द्र सरकार के एक बयान के अनुसार सरकार जीवित व्यक्तियों पर भी डाक टिकट निकालने का विचार कर रही है। संचार मंत्री के अनुसार देश की विशिष्ट हस्तियों पर डाक टिकट छापने के लिये एक समिति इस बात का विचार कर रही है। सरकार ने जो दो-चार नाम गिनाये हैं उसके अनुसार शाहरुख खान, सचिन तेंडुलकर, सानिया मिर्जा आदि के चित्रों वाले डाक टिकट जारी किये जाने की योजना है।

हमारे देश में कुछ न कुछ नया अजूबा करने-दिखाने की हमेशा होड़ लगी रहती है। यह कथित नायाब विचार भी इसी “खुजली” का एक नमूना है। सबसे पहली बात तो यह है कि पहले से ही कई मरे हुए व्यक्तियों, प्रकृति, पशु-पक्षी, स्मारक आदि पर डाक टिकट जारी हो चुके हैं, फ़िर ये नया शिगूफ़ा कि “जीवित व्यक्तियों पर भी डाक टिकट” जारी किये जायेंगे, की कोई तुक नहीं है। जिस देश में इतनी मतभिन्नता हो, जहाँ “महान” माने जाने के इतने अलग-अलग पैमाने हों, जहाँ हरेक मरे हुए नेताओं तक की इज्जत नहीं होती हो, कई मरे हुए नेताओं को लोग आज भी खुलेआम गालियाँ देते हों, ऐसे में जीवित व्यक्तियों पर डाक टिकट जारी करना नितांत मूर्खता है, और जरूरत भी क्या है? क्या पहले से मरे हुए व्यक्ति कम पड़ रहे हैं, क्या विभिन्न जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, फ़ूल-पत्तियाँ आदि कम हैं जो नये-नये विवाद पैदा करने का रास्ता बना रहे हो? सरकार खुद ही सोचे, क्या शाहरुख सर्वमान्य हैं? क्या समूचा भारत उन्हें पसन्द करता है? और सबसे बड़ी बात तो यह कि डाक टिकट जारी करने का पैमाना क्या होगा? किस आधार पर यह तय किया जायेगा कि फ़लाँ व्यक्तित्व पर डाक टिकट जारी करना चाहिये? क्या डाक टिकट पर शाहरुख को सिगरेट पीते दिखाया जायेगा? या सचिन कोका-कोला की बोतल के साथ डाक टिकट पर दिखेंगे? सौ बात की एक बात तो यही है कि ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी है? क्या मरे हुए और पुराने “सिम्बॉल” कम पड़ रहे हैं, जो जीवितों के पीछे पड़े हो? या कहीं सरकार भी हमारे “न्यूड” (न्यूज) चैनलों की तरह सोचने लगी है कि धोनी, राखी सावन्त आदि पर डाक टिकट जारी करके वह डाक विभाग को घाटे से उबार लेगी? या उसे कोरियर के मुकाबले अधिक लोकप्रिय बना देगी? कोई तो लॉजिक बताना पड़ेगा…

जब एक बार सरकार कोई नीतिगत निर्णय कर लेगी तो सबसे पहले हमारे नेता उसमें कूद पड़ेंगे। इस बात की क्या गारंटी है कि कांग्रेसी चमचे सोनिया गाँधी पर डाक टिकट जारी नहीं करेंगे, फ़िर राहुल गाँधी, फ़िर प्रियंका गाँधी, फ़िर “वर्ल्ड चिल्ड्रन्स डे” के अवसर पर प्रियंका के दोनो बच्चे एक डाक टिकट पर… यानी एक अन्तहीन सिलसिला चल निकलेगा। एक बात और नजर-अन्दाज की जा रही है कि डाक टिकट पर छपे महापुरुषों के वर्तमान में क्या हाल होते हैं। सबसे अधिक खपत महात्मा गाँधी के डाक टिकटों की होती है। गाँधी की तस्वीर वाले उस डाक टिकट को न जाने कहाँ-कहाँ, और न जाने कैसे-कैसे रखा जाता है, थूक लगाई जाती है, रगड़ा जाता है, पोस्ट मास्टर अपनी बीवी का सारा गुस्सा उस पर जोर से ठप्पा लगाकर निकालता है। नोटों पर छपे गाँधी न जाने कैसे-कैसे लोगों के हाथों से गुजरते हैं, महिलाओं द्वारा जाने कहाँ-कहाँ रखे जाते हैं, क्या ये सब अपमानजनक नहीं है? क्या यह जरूरी है कि महापुरुषों का सम्मान नोटों और डाक टिकट पर ही हो? रही प्रेरणा की बात, तो भाई मल्लिका शेरावत पर डाक टिकट छापने से किसको प्रेरणा मिलने वाली है?

जिस देश में नल से पानी लेने की बात पर हत्या हो जाती हो, घूरकर देखने की बात पर अपहरण हो जाते हों, वहाँ जीवित व्यक्तियों पर डाक टिकट जारी करने से विवाद पैदा नहीं होंगे क्या? सोनिया पर डाक टिकट जारी होगा तो नरेन्द्र मोदी पर भी होगा और ज्योति बसु पर भी होगा। सचिन तेंडुलकर पर जारी होगा तो बंगाली कैसे पीछे रहेंगे… सौरव दादा पर भी एक डाक टिकट लो। सानिया मिर्जा पर डाक टिकट निकाला तो बुर्के में फ़ोटो क्यों नहीं छापा? शाहरुख के डाक टिकट की धूम्रपान विरोधियों द्वारा होली जलाई जायेगी। और फ़िर उद्योगपति पीछे रहेंगे क्या? मुकेश अम्बानी की जेब में 150 सांसद हैं तो उनका डाक टिकट जरूर-जरूर जारी होगा, तो विजय माल्या भी अपनी कैलेण्डर गर्ल्स के साथ एक डाक टिकट पर दिखाई देंगे… मतलब एक न खत्म होने वाली श्रृंखला चालू हो जायेगी। हाँ एक बात जरूर है कि सरकार की डाक टिकटों की बिक्री जरूर बढ़ जायेगी, कैसे? भई जब भी कांग्रेसी किसी राज्य से पोस्टकार्ड अभियान चलायेंगे तो सोनिया के टिकटों की माँग एकदम बढ़ जायेगी। बुद्धदेव भट्टाचार्य के मुखड़े वाले डाक टिकट सिंगूर और नंदीग्राम में खूब बिकेंगे। सबसे ज्यादा मजा लेगी आम जनता, जो अपनी-अपनी पसन्द के मुताबिक डाक टिकट के सामने वाले हिस्से में थूक लगायेगी।

यदि मजाक को एक तरफ़ रख दिया जाये, तो कुल मिलाकर सरकार का यह निर्णय बेहद बेतुका, समय खराब करने वाला और नये बखेड़े खड़ा करने वाला है। इसकी बजाय सरकार को ऐसे वीरों पर डाक टिकट जारी करना चाहिये जो निर्विवाद हों (और ऐसा शायद ही कोई मिले)।

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Friday, 28 March, 2008

क्या सचमुच भारत का मीडिया विदेशी हाथों में पहुँच चुका है?

Foreign Investment Indian Media Groups
भारत में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिक कौन हैं? हाल ही में एक-दो ई-मेल के जरिये इस बात की जानकारी मिली लेकिन नेट पर सर्च करके देखने पर कुछ खास हाथ नहीं लग पाया (हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो मीडिया वाले ही बता सकते हैं) कि भारत के कई मीडिया समूहों के असली मालिक कौन-कौन हैं?

हाल की कुछ घटनाओं के मीडिया कवरेज को देखने पर साफ़ पता चलता है कि कतिपय मीडिया ग्रुप एक पार्टी विशेष (भाजपा) के खिलाफ़ लगातार मोर्चा खोले हुए हैं, गुजरात चुनाव और चुनावों के पूर्व की रिपोर्टिंग इसका बेहतरीन नमूना रहे। इससे शंका उत्पन्न होती है कि कहीं हमारा मीडिया और विख्यात मीडियाकर्मी किन्हीं “खास” हाथों में तो नहीं खेल रहे? भारत में मुख्यतः कई मीडिया और समाचार समूह काम कर रहे हैं, जिनमें प्रमुख हैं – टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दू, आनन्दबाजार पत्रिका, ईनाडु, मलयाला मनोरमा, मातृभूमि, सहारा, भास्कर और दैनिक जागरण समूह। अन्य कई छोटे समाचार पत्र समूह भी हैं। आईये देखें कि अपुष्ट और गुपचुप खबरें क्या कहती हैं…

समाचार चैनलों में एक लोकप्रिय चैनल है NDTV, जिसका आर्थिक फ़ंडिंग स्पेन के “गोस्पेल ऑफ़ चैरिटी” से किया जाता है। यह चैनल भाजपा का खासमखास विरोधी है। इस चैनल में अचानक “पाकिस्तान प्रेम” जाग गया है, क्योंकि मुशर्रफ़ ने इस एकमात्र चैनल को पाकिस्तान में प्रसारण की इजाजत दी। इस चैनल के सीईओ प्रणय रॉय, कम्युनिस्ट पार्टी के कर्ता-धर्ता प्रकाश करात और वृन्दा करात के रिश्तेदार हैं। सुना गया है कि इंडिया टुडे को भी NDTV ने खरीद लिया है, और वह भी अब भाजपा को गरियाने लग पड़ा है। एक और चैनल है CNN-IBN, इसे “सदर्न बैप्टिस्ट चर्च” के द्वारा सौ प्रतिशत की आर्थिक मदद दी जाती है। इस चर्च का मुख्यालय अमेरिका में है और दुनिया में इसके प्रचार हेतु कुल बजट 800 मिलियन डॉलर है। भारत में इसके कर्ताधर्ता राजदीप सरदेसाई और उनकी पत्नी सागरिका घोष हैं। गुजरात चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी और हिन्दुओं को लगातार गाली देने और उनकी छवि बिगाड़ने का काम बड़ी ही “स्वामिभक्ति” से इन चैनलों ने किया। गुजरात के दंगों के दौरान जब राजदीप और बरखा दत्त स्टार टीवी के लिये काम कर रहे थे, तब उन्होंने सिर्फ़ मुसलमानों के जलते घर दिखाये और मुसलमानों पर हुए अत्याचार की कहानियाँ ही सुनाईं, किसी भी हिन्दू परिवार का इंटरव्यू नहीं लिया गया, मानो उन दंगों में हिन्दुओं को कुछ हुआ ही न हो।

टाइम्स समूह “बेनेट कोलमेन” द्वारा संचालित होता है। “वर्ल्ड क्रिश्चियन काउंसिल” इसका 80% खर्चा उठाती है, एक अंग्रेज और एक इतालवी रोबर्टियो मिन्डो इसके 20% शेयरों के मालिक हैं। यह इतालवी व्यक्ति सोनिया गाँधी का नजदीकी भी बताया जाता है। स्टार टीवी तो खैर है ही ऑस्ट्रेलिया के उद्योगपति का और जिसका एक बड़ा आका है सेंट पीटर्स पोंटिफ़िशियल चर्च मेलबोर्न। 125 वर्ष पुराना दक्षिण के एक प्रमुख समाचार समूह “द हिन्दू” को अब जोशुआ सोसायटी, बर्न्स स्विट्जरलैण्ड ने खरीद लिया है। इसके कर्ताधर्ता एन.राम की पत्नी स्विस नागरिक भी हैं। दक्षिण का एक तेलुगु अखबार “आंध्र ज्योति” को हैदराबाद की मुस्लिम पार्टी “एम-आई-एम” और एक कांग्रेसी सांसद ने मिलकर खरीद लिया है। “द स्टेट्समैन” समूह को कम्युनिस्ट पार्टी संचालित करती है, और “कैराल टीवी” को भी। “मातृभूमि” समूह में मुस्लिम लीग के नेताओं का पैसा लगा हुआ है। “एशियन एज” और “डेक्कन क्रॉनिकल” में सऊदी अरब का भारी पैसा लगा हुआ है। जैसा कि मैने पहले भी कहा कि हालांकि ये खबरें सच हैं या नहीं इसका पता करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि जिस देश में सरकार को यह तक पता नहीं लगता कि किसी एनजीओ को कुल कितनी मदद विदेश से मिली, वहाँ किसी समाचार पत्र के असली मालिक या फ़ाइनेन्सर का पता लगाना तो बहुत दूर की बात है। अधिग्रहण, विलय, हिस्सेदारी आदि के जमाने में अन्दर ही अन्दर बड़े समाचार समूहों के लाखों-करोड़ों के लेन-देन हुए हैं। ये खबरें काफ़ी समय से इंटरनेट पर मौजूद हैं, हवा में कानोंकान तैरती रही हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि आपके मुहल्ले का दादा कौन है ये आप जानते हैं लेकिन लोकल थानेदार जानते हुए भी नहीं जानता। अब ये पता लगाना शौकिया लोगों का काम है कि इन खबरों में कितनी सच्चाई है, क्योंकि कोई खोजी पत्रकार तो ये करने से रहा। लेकिन यदि इसमें जरा भी सच्चाई है तो फ़िर ब्लॉग जगत का भविष्य उज्जवल लगता है।

ऐसे में कुल मिलाकर तीन समूह बचते हैं, पहला “ईनाडु” जिसके मालिक हैं रामोजी राव, “भास्कर” समूह जिसके मालिक हैं रमेशचन्द्र अग्रवाल और तीसरा है “जागरण” समूह। ये तीन बड़े समूह ही फ़िलहाल भारतीय हाथों में हैं, लेकिन बदलते वक्त और सरकार की मीडिया क्षेत्र को पूरी तरह से विदेशियों के लिये खोलने की मंशा को देखते हुए, कब तक रहेंगे कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात तो तय है कि जो भी मीडिया का मालिक होता है, वह अपनी राजनैतिक विचारधारा थोपने की पूरी कोशिश करता है, इस हिसाब से भाजपा के लिये आने वाला समय मुश्किलों भरा हो सकता है, क्योंकि उसे समर्थन करने वाले “पाञ्चजन्य” (जो कि खुद संघ का मुखपत्र है) जैसे इक्का-दुक्का अखबार ही बचे हैं, बाकी सब तो विरोध में ही हैं।

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Tuesday, 25 March, 2008

राहुल गाँधी के रहस्यमयी “स्टंट” और गंभीर सुरक्षा खतरे…

Rahul Gandhi Orissa Visit Security Threat
“राजकुमार” आजकल भारत खोज अभियान पर निकले हुए हैं, उन्हें असली भारत खोजना है (शायद उन्होंने अपने परनाना की पुस्तक नहीं पढ़ी होगी)। चुनावी वर्ष में इस भारत को खोजने की शुरुआत उन्होंने उड़ीसा के कालाहांडी से की है। अब दिल्ली में बैठकर उन्हें कालाहांडी के बारे में कैसे पता चलता, न तो उनके पास संचार की कोई व्यवस्था है, न ही कांग्रेस के कार्यकर्ता, न ही पुस्तकें, न ही पत्रकार… सो राहुल बाबा ने उड़ीसा सरकार के लाखों रुपये खर्च करवाने की ठान ही ली। जैसा “स्टंट” उन्होंने बुंदेलखंड में एक दलित के यहाँ खाना खाकर और रात बिताकर किया था, कुछ-कुछ वैसा ही “स्टंट” उन्होंने उड़ीसा की यात्रा के दौरान भी करने की कोशिश की, ये और बात है कि उनके इस स्टंट की देश को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती थी। राहुल गाँधी की इस कलरफ़ुल यात्रा का अन्त एकदम रंगहीन रहा, न तो उन्होंने इन जिलों के बारे में कोई ठोस योजना पेश की, न ही उनके श्रीमुख से कोई खास उदगार फ़ूटे, हाँ लेकिन अपनी खास हरकतों से उन्होंने सुरक्षा अधिकारियों और केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियों की नींद जरूर उड़ा दी थी (और ऐसा उन्होंने पहली बार नहीं किया है)।

उड़ीसा की यात्रा के दौरान राहुल ने स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा अधिकारियों को खासा परेशान रखा। राहुल गाँधी एक बार देर रात को अज्ञात स्थान पर भी गये और उन्होंने स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना तक नहीं दी। अपनी बहरामपुर यात्रा के दौरान राहुल कंकिया नाम के गाँव गये, जो कि गोपालपुर कस्बे से 30 किमी दूर है। उनके साथ एक मिशनरी एनजीओ अधिकारी और सिर्फ़ दो सुरक्षा गार्ड थे। वह उस एनजीओ के दफ़्तर में लगभग रात 10 बजे गये और कुछ घंटे उन्होंने वहाँ बिताये। उसके बाद वे पास ही के एक रहवासी स्कूल में भी गये और वहाँ उन्होंने कुछ चॉकलेट बाँटे। वह एनजीओ एक प्रसिद्ध ईसाई मिशनरी का हिस्सा है और वह सक्रिय रूप से उड़ीसा के दक्षिणी जिलों में खुलकर धर्मान्तरण में लगा हुआ है। राहुल गाँधी ने उस एनजीओ को जितना वक्त दिया उतना वक्त तो उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को भी नहीं दिया। राहुल गाँधी अलसुबह अपने कैम्प में लौटे, जब उनके कार्यकर्ता उन्हें खोजने निकल पड़े थे।

गायब होने का कुछ ऐसा ही स्टंट उन्होंने कोरापुट जिले के दौरे में भी किया, जहाँ उनका स्वागत एक धार्मिक संस्था (जाहिर है कि ईसाई) ने बड़े जोरशोर से किया। यहाँ भी वे सिर्फ़ चार सुरक्षाकर्मियों को साथ लेकर उस संस्था में गये, और स्थानीय प्रशासन को खबर तक नहीं की। राहुल गाँधी ने स्थानीय पुलिस का पायलट वाहन लेने से भी इंकार कर दिया और यहाँ तक कि उन्होंने कोरापुट के एसपी को भी अपने पीछे आने से मना कर दिया, जबकि वे जानते थे कि यह एक खतरनाक नक्सली इलाका है। बेहरामपुर की घटना के बारे में गंजम जिले के एसपी ने स्वीकार किया कि राहुल अपने तय कार्यक्रम से हटकर किसी अज्ञात स्थान पर गये थे, लेकिन इसके बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया।

इस घटना का उल्लेख विधानसभा में बीजद के विधायक कल्पतरु दास ने 11 मार्च को विशेष नोटिस के जरिये उठाया, उन्होंने आरोप लगाया राहुल गाँधी की यह आधी रात की यात्रा पहले से तय थी, एक रिटायर्ड आईपीएस पंकज कुमार गुप्ता, जो कि राजीव गाँधी फ़ाउंडेशन का काम भी देखते हैं, वह राहुल को कहीं ले गये थे और जानबूझकर स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी गई। उनका यह भी कहना है कि राहुल गाँधी अपनी माँ के कहने पर ही उस खास मिशनरी में गुप्त रूप से गये और धर्मांतरण के काम की जानकारी ली। चलो मान भी लिया जाये कि ये बाद वाला आरोप सिर्फ़ राजनैतिक आरोप है, लेकिन यह सच्चाई तो फ़िर भी अपनी जगह है कि घने जंगलों वाले इस इलाके में नक्सली बेहद सक्रिय हैं। नक्सलियों का आंतरिक नेटवर्क भी काफ़ी मजबूत है, यदि राहुल गाँधी की इस कथित गुप्त यात्रा की खबर उन्हें लग जाती और वे कोई अनर्थ कर बैठते, या तो बारूदी सुरंग बिछाते या अपहरण कर लेते, तो क्या होता? क्या तब राज्य की बीजद-भाजपा सरकार के माथे पर ठीकरा नहीं फ़ोड़ा जाता? कि उन्होंने राजकुमार की सुरक्षा ठीक से नहीं की। क्या 39 वर्ष की आयु में भी वे इतने अनजान हैं कि यदि उनकी हत्या हो जाती है तो इसके देश की जनता पर क्या तात्कालिक परिणाम हो सकते हैं? वह इतनी गैरजिम्मेदाराना हरकत कैसे कर सकते हैं, जिससे खुद उनको तो खतरा हो ही सकता है, लेकिन अन्य कई लोगों की नौकरी भी खतरे में पड़ सकती है।

राहुल गाँधी का कहना है कि वे इन आदिवासी क्षेत्रों की जमीनी हकीकत जानने के लिये उत्सुक हैं और वे इन क्षेत्रों का दौरा करके कुछ वनवासियों के जीवन को नजदीक से देखकर “प्रैक्टिकल नॉलेज” ग्रहण करना चाहते हैं। कितनी हास्यास्पद बात है ना !! कोरापुट-बोलांगीर-कालाहांडी के बारे में मैं राहुल गाँधी से ज्यादा जानता हूँ, जबकि मैं कभी उड़ीसा नहीं गया। राहुल बाबा शायद नही जानते कि आजादी के बाद उड़ीसा में कांग्रेस ने चालीस साल तक राज किया ? वे नहीं जानते कि ये तीन जिले राज्य के कुल भूभाग का 20 प्रतिशत हैं ? वे यह भी नहीं जानते कि घने जंगलों, प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर, बेशकीमती खनिजों से भरपूर इन तीन जिलों में राज्य के कुल 24 प्रतिशत गरीब रहते हैं? वे नहीं जानते कि विश्व मीडिया में भुखमरी का उदाहरण देने की शुरुआत कालाहांडी से ही होती है? आखिर राजकुमार क्या जानना चाहते हैं? चार साल के अपने कार्यकाल में संसद में सिर्फ़ दो बार मुँह खोलने वाले राहुल बाबा चमचों से बचने के लिये क्या करने वाले हैं? सिर्फ़ संसद में मम्मी के पीछे बैठने से कुछ नहीं होगा। वे अपना दृष्टिकोण और विचार भी तो मीडिया को स्पष्ट करें। जिस तरह से उनकी मम्मी मीडिया को एक “पैरपोंछ” समझती हैं, कहीं वे भी तो उसी मानसिकता से ग्रस्त नहीं हैं?

यदि धर्मान्तरण के आरोपों को एक तरफ़ रख भी दिया जाये, तो भी राहुल गाँधी का इस प्रकार सुरक्षा व्यवस्था को धोखा देकर गायब हो जाना, मनचाहे “स्टंट” दिखाना, गुपचुप मुलाकातें करना, क्या दर्शाता है? हीरोगिरी, अपरिपक्वता, गैरजिम्मेदाराना हरकत, लापरवाही या सामंती मानसिकता? आप बतायें…


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सन्दर्भ : देबाशीष त्रिपाठी, ऑर्गेनाइजर (भुवनेश्वर)

Monday, 24 March, 2008

गंगाजल से मध्यान्ह भोजन “अपवित्र” हो जाता है?

Mid Day Meal Scheme ISKCON Ujjain
केन्द्र और राज्य सरकारों की मिलीजुली महती योजना है मध्यान्ह भोजन योजना। जैसा कि सभी जानते हैं कि इस योजना के तहत सरकारी प्राथमिक शालाओं में बच्चों को मध्यान्ह भोजन दिया जाता है, ताकि गरीब बच्चे पढ़ाई की ओर आकर्षित हों और उनके मजदूर / मेहनतकश/ ठेले-रेहड़ी वाले/ अन्य छोटे धंधों आदि में लगे माँ-बाप उनके दोपहर के भोजन की चिंता से मुक्त हो सकें। इस योजना के गुणदोषों पर अलग से चर्चा की जा सकती है क्योंकि इस योजना में कई तरह का भ्रष्टाचार और अनियमिततायें हैं, जैसी कि भारत की हर योजना में हैं। फ़िलहाल बात दूसरी है…

जाहिर है कि उज्जैन में भी यह योजना चल रही है। यहाँ इस सम्पूर्ण जिले का मध्यान्ह भोजन का ठेका “इस्कॉन” को दिया गया है। “इस्कॉन” यानी अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ को जिले के सभी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन (रोटी-सब्जी-दाल) बनाने और पहुँचाने का काम दिया गया है। इसके अनुसार इस्कॉन सुबह अपनी गाड़ियों से शासकीय स्कूलों में खाना पहुँचाता है, जिसे बच्चे खाते हैं। चूँकि काम काफ़ी बड़ा है इसलिये इस हेतु जर्मनी से उन्होंने रोटी बनाने की विशेष मशीन बुलवाई है, जो एक घंटे में 10,000 रोटियाँ बना सकती है। (फ़िलहाल इस मशीन से 170 स्कूलों हेतु 28,000 बच्चों का भोजन बनाया जा रहा है) (देखें चित्र)

जबसे इस मध्यान्ह भोजन योजना को इस्कॉन को सौंपा गया है, तभी से स्थानीय नेताओं, सरपंचों और स्कूलों के पालक-शिक्षक संघ के कई चमचेनुमा नेताओं की भौंहें तनी हुई हैं, उन्हें यह बिलकुल पसन्द नहीं आया है कि इस काम में उन्हें “कुछ भी नहीं” मिल रहा। इस काम को खुले ठेके के जरिये दिया गया था जिसमें जाहिर है कि “इस्कॉन” का भाव सबसे कम था (दो रुपये साठ पैसे प्रति बच्चा)। हालांकि इस्कॉन वाले इतने सक्षम हैं और उनके पास इतना विदेशी चन्दा आता है कि ये काम वे मुफ़्त में भी कर सकते थे (इस्कॉन की चालबाजियों और अनियमितताओं पर एक लेख बाद में दूँगा)। अब यदि मान लिया जाये कि दो रुपये साठ पैसे प्रति बच्चे के भाव पर इस्कॉन जिले भर के शासकीय स्कूलों में रोटी-सब्जी “नो प्रॉफ़िट-नो लॉस” के स्तर पर भी देता है (हालांकि इस महंगाई के जमाने में यह बात मानने लायक नहीं है), तो विचार कीजिये कि बाकी के जिलों और तहसीलों में चलने वाली इस मध्यान्ह भोजन योजना में ठेकेदार (जो कि प्रति बच्चा चार-पाँच रुपये के भाव से ठेका लेता है) कितना कमाता होगा? कमाता तो होगा ही, तभी वह यह काम करने में “इंटरेस्टेड” है, और उसे यह कमाई तब करनी है, जबकि इस ठेके को लेने के लिये उसे जिला पंचायत, सरपंच, स्कूलों के प्रधानाध्यापक, पालक-शिक्षक संघ के अध्यक्ष और यदि बड़े स्तर का ठेका हुआ तो जिला शिक्षा अधिकारी तक को पैसा खिलाना पड़ता है। जाहिर सी बात है कि इस्कॉन को यह ठेका मिलने से कईयों के “पेट पर लात” पड़ गई है (हालांकि सबसे निरीह प्राणी यानी पढ़ाने वाले शिक्षक इससे बहुत खुश हैं, क्योंकि उनकी मगजमारी खत्म हो गई है), और इसीलिये इस योजना में शुरु से ही “टाँग अड़ाने” वाले कई तत्व पनपे हैं। मामले को ठीक से समझने के लिये लेख का यह विस्तार जरूरी था।

“टाँग अड़ाना”, “टाँग खींचना” आदि भारत के राष्ट्रीय “गुण” हैं। उज्जैन की इस मध्यान्ह भोजन योजना में सबसे पहले आरोप लगाया गया कि इस्कॉन इस योजना को चलाने में सक्षम नहीं है, फ़िर जब इस्कॉन ने इस काम के लिये एक स्थान तय किया और वहाँ शेड लगाकर काम शुरु किया तो जमीन के स्वामित्व और शासन द्वारा सही/गलत भूमि दिये जाने को लेकर बवाल मचा दिया गया। जैसे-तैसे इससे निपट कर इस्कॉन ने काम शुरु किया, 10000 रोटियाँ प्रति घंटे बनाने की मशीन मंगवाई तो “भाई लोगों” ने रोटी की गुणवत्ता पर तमाम सवाल उठाये। बयानबाजियाँ हुई, अखबार रंगे गये, कहा गया कि रोटियाँ मोटी हैं, अधपकी हैं, बच्चे इसे खा नहीं सकते, बीमार पड़ जायेंगे आदि-आदि। अन्ततः कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी को खुद वहाँ जाकर रोटियों की गुणवत्ता की जाँच करनी पड़ी, न कुछ गड़बड़ी निकलना थी, न ही निकली (इस्कॉन वालों की सेटिंग भी काफ़ी तगड़ी है, और काफ़ी ऊपर तक है, ये छुटभैये नेता कहाँ लगते उसके आगे)। लेकिन ताजा आरोप (वैसे तो आरोप काफ़ी पुराना है) ज्यादा गंभीर रूप लिये हुए है, क्योंकि इसमें “धर्म” का घालमेल भी कर दिया गया है।

असल में शुरु से ही शासकीय मदद प्राप्त मदरसों ने मध्यान्ह भोजन योजना से भोजन लेने से मना कर दिया था। “उनके दिमाग में किसी ने यह भर दिया था” कि इस्कॉन में बनने वाले रोटी-सब्जी में गंगाजल और गोमूत्र मिलाया जाता है और फ़िर उस भोजन को भगवान को भोग लगाकर सभी दूर भिजवाया जाता है। काजियों और मुल्लाओं द्वारा विरोध करने के लिये “गोमूत्र” और “भगवान को भोग” नाम के दो शब्द ही काफ़ी थे, उन्होंने “धर्म भ्रष्ट होने” का आरोप लगाते हुए मध्यान्ह भोजन का बहिष्कार कर रखा था। इससे मदरसों में पढ़ने वाले गरीब बच्चे उस स्वादिष्ट भोजन से महरूम हो गये थे। कहा गया कि मन्दिर में पका हुआ और गंगाजल मिलाया हुआ भोजन अपवित्र होता है, इसलिये मदरसों में मुसलमानों को यह भोजन नहीं दिया जा सकता (जानता हूँ कि कई पाठक मन ही मन गालियाँ निकाल रहे होंगे)। कलेक्टर और इस्कॉन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने मदरसों में जाकर स्थिति स्पष्ट करने की असफ़ल कोशिश भी की, लेकिन वे नहीं माने। इस तथाकथित अपवित्र भोजन की शिकायत सीधे मानव संसाधन मंत्रालय को कर दी गई। तुरत-फ़ुरत अर्जुनसिंह साहब ने एक विशेष अधिकारी “श्री हलीम खान” को उज्जैन भेजा ताकि वे इस्कॉन में बनते हुए भोजन को खुद बनते हुए देखें, उसे चखें और शहर काजी तथा मदरसों के संचालकों को “शुद्ध उर्दू में” समझायें कि यह भोजन “ऐसा-वैसा” नहीं है, न ही इसमें गंगाजल मिला हुआ है, न ही गोमूत्र, रही बात भगवान को भोग लगाने की तो उससे धर्म भ्रष्ट नहीं होता और सिर्फ़ इस कारण से बेचारे गरीब मुसलमान बच्चों को इससे दूर न रखा जाये। काजी साहब ने कहा है कि वे एक विशेषाधिकार समिति के सामने यह मामला रखेंगे (जबकि भोजन निरीक्षण के दौरान वे खुद भी मौजूद थे) और फ़िर सोचकर बतायेंगे कि यह भोजन मदरसे में लिया जाये कि नहीं। वैसे इस योजना की सफ़लता और भोजन के स्वाद को देखते हुए पास के देवास जिले ने भी इस्कॉन से आग्रह किया है कि अगले वर्ष से उस जिले को भी इसमें शामिल किया जाये।

वैसे तो सारा मामला खुद ही अपनी दास्तान बयाँ करता है, इस पर मुझे अलग से कोई कड़ी टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन फ़िर भी यदि मध्यान्ह भोजन योजना में हो रहे भ्रष्टाचार और इसके विरोध हेतु धर्म का सहारा लेने पर यदि आपको कुछ कहना हो तो कहें…


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Wednesday, 19 March, 2008

यह मेरी आखिरी ब्लॉग पोस्ट हो सकती है…

भाईयों और बहनों, यह मेरी 200 वीं पोस्ट है। “श्मशान वैराग्य” किसे कहते हैं यह कई लोगों को मालूम होगा। जिन्हें नहीं मालूम, उन्हें बता दूँ कि जब हम किसी को श्मशान में छोड़ने जाते हैं और वहाँ उस मुर्दे की मिट्टी को जलते देखते हैं तो मन में एक विशेष भाव पैदा होता है। “यह जगत तो मिथ्या है…”, “यहाँ सब बेकार है…”, "ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं…" टाइप की भावनायें पैदा होती हैं। यही भाव आज मेरे मन में भी पैदा हो रहा है।

26 जनवरी 2007 को जब मैंने पहली-पहली पोस्ट लिखी थी, तब मैं सोचता था कि ब्लॉग के जरिये क्रांति बस आने ही वाली है। विगत चौदह माह में 200 पोस्टें लिखने, 50 सब्स्क्राइबर बना लेने, लगभग 18000 बार पढ़े जाने के अलावा मैंने किया क्या है? नेताओं, अफ़सरों, भ्रष्टाचार, अनैतिकता के खिलाफ़ जमकर लिखा, कुछ लोगों ने पसन्द भी किया। एक-एक ब्लॉग को 100-150 लोगों ने पढ़ा भी, लेकिन उससे हुआ क्या? क्या मैंने कुछ हासिल किया? कुछ नहीं…। मुझे आत्मसंतुष्टि के अलावा क्या मिला? कुछ नहीं…। क्या मैं कुछ लोगों के विचारों को प्रभावित कर पाया? या क्या मैंने कुछ लोगों के विचार बदलने में सफ़लता हासिल की? पता नहीं…। मेरे अच्छे-अच्छे लेखों की दो-चार लोगों ने तारीफ़ कर दी तो उससे क्या? इसकी बजाय तो गालीगलौज करने वाले, हिन्दू-मुस्लिम दंगों पर रोटी सेंकने वाले, दलित-दलित, महिला-महिला भजने वाले कई ब्लॉग हैं जो आये दिन छाये रहते हैं, विवाद करते हैं, विवाद पैदा करते हैं, विवादों में ही अपनी दुनिया रमाते हैं, कुछ नकली नामों से लिखते हैं, कुछ नकली नामों से अपने ही ब्लॉग पर टिप्पणी कर देते हैं, यानी कि चालबाजियाँ, साँठगाँठ, उठापटक करने वाले ब्लॉग ज्यादा पढ़े जा रहे हैं। आज तक किसी ब्लॉग एग्रीगेटर के काउंटर पर मैंने टॉप नहीं किया (और मूर्खों की तरह मैं समझता था कि अच्छा लिखना ही काफ़ी है)।

फ़िर क्यों मैं ब्लॉग लिख रहा हूँ, अपना समय नष्ट कर रहा हूँ, अपना पैसा खराब कर रहा हूँ… क्या ब्लॉग लिखने से मुझे कमाई हो रही है? बिलकुल नहीं…। उलटा मेरा कीमती समय, बेशकीमती ऊर्जा, इंटरनेट के खर्चे आदि इसमें लग रहा है। क्या भविष्य में इस प्रकार के लेखन से मुझे कोई कमाई की सम्भावना है? अभी तक तो नहीं लगता…। क्या बड़ी मेहनत से रिसर्च करके तैयार किये गये मेरे लेखों को कोई अखबार छापेगा? यदि छापेगा तो पैसे देगा? यदि बगैर पैसों के छाप भी देगा तो उससे क्या होने वाला है? हजारों लोग यूँ ही रोज लाखों पन्ने काले कर देते हैं, कहीं कुछ होता है क्या? क्या ऐसे लेख लिखने भर से नेता, अफ़सर, उद्योगपति, भ्रष्ट बाबू आदि सुधर जायेंगे? नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला, फ़िर मैं ब्लॉग क्यों लिख रहा हूँ? सिर्फ़ अपने मन के लिये, अपने मन को सहलाने के लिये? यदि हाँ तो इसकी कीमत बहुत ज्यादा है, जो मेरे जैसे निम्न-मध्मवर्गीय व्यक्ति के लिये मायने रखती है। तरक्की हुई है, इसमें कोई दो राय नहीं है। पहले 20 सब्स्क्राइबर थे, जो बढ़कर 50 हो गये हैं, पहले प्रति पोस्ट पाठकों का औसत 20-30 ही था जो अब बढ़कर 70-80 हो गया है, एडसेंस खाते में जीरे के समान 5 डॉलर भी जमा हो गये हैं, लेकिन फ़िर वही सवाल कि इस सबका फ़ायदा क्या?

बुजुर्गों ने कहा है कि “शौक ऐसा पालो कि जो तुम्हारी औकात का हो…” क्या ब्लॉग लेखन का शौक मेरे बूते का है? मुझे नहीं लगता। यह शौक अब धीरे-धीरे नशा बनता जा रहा है। जिस तरह से सिगरेट, शराब का नशा होता है, उसी तरह से ब्लॉग लेखन भी एक लत होती है। जब तक आप ब्लॉग नहीं लिख लेते तब तक आप बेचैन रहते हैं, एक प्रकार की “प्रसव-पीड़ा” होती रहती है। किसी समस्या पर नहीं लिख पाते तो मन बेचैन रहता है, यह साफ़-साफ़ “लत” के लक्षण हैं। इस नशे का अगला चरण होता है, “कितने लोगों ने पढ़ा…” उसका अगला चरण होता है, “कितने लोगों ने टिप्पणी की…”, फ़िर विचार मंथन, नहीं पढ़ा तो क्यों नहीं पढ़ा? पढ़ लिया तो टिप्पणी क्यों नहीं की? टिप्पणी की तो विरोधी स्वर क्यों निकाले? यानी अन्तहीन साँप-बिच्छू। (सौभाग्य से अभी मैं नशे के पहले चरण में ही हूँ, यानी कि सिर्फ़ जो मन में आये लिखता हूँ, कोई पढ़े या न पढ़े, टिप्पणी करे न करे, अच्छा बोले या बुरा कोई फ़र्क नहीं पड़ता), लेकिन आखिर यह सब कब तक?

हाल ही में किसी विद्वान ने कहा है कि “अधिक ब्लॉगिंग करने से मानव कर्महीन, निरर्थक और मानसिक खोखला होता जाता है…”। एक मनोचिकित्सक कहते हैं कि Paralysis by Analysis, यानी अच्छा ब्लॉग लिखने के लिये Research and Analysis करना पड़ता है जिससे मानसिक पैरेलिसिस भी हो सकता है, ऊपर से “बुद्धिजीवी” कहलाये जाने का खतरा हमेशा सिर पर मँडराता रहता है। समझ में नहीं आता क्या किया जाये? ब्लॉगिंग पहले-पहल एक शौक होता है, फ़िर वह आत्मसंतुष्टि का साधन बनता है, फ़िर पागलपन और अन्त में एक खतरनाक नशा। ऐसा घातक नशा, जिसका प्रभाव सामने वाले को दिखता तक नहीं… मैं फ़िलहाल दूसरी स्टेज में पहुँचा हुआ हूँ, यानी आत्मसंतुष्टि वाली स्टेज, लेकिन इस पर मैं कब तक रह सकूँगा कह नहीं सकता। बढ़ते खर्चों (और लिखने से कोई कमाई नहीं) तथा ब्लॉग लिखने के लिये होने वाली ऊर्जा विनाश को देखते हुए मेरे पास ज्यादा समय नहीं बचा है…शायद ब्लॉग जगत को अलविदा कहने का वक्त आ गया है।

डिस्क्लेमर : उज्जैन की भांग बहुत प्रसिद्ध है, होली का माहौल है। भंग की तरंग में ऊपर लिखित नायाब, अफ़लातून (और शायद फ़ायदेमंद) विचार सामने आये हैं, जिससे अब मैं वाकई गंभीरता से सोचने लगा हूँ कि भांग का नशा ज्यादा बेहतर है या ब्लॉग लिखने का? दो रुपये की भांग में पूरा दिन दिमाग चकाचक और तबियत झकाझक, जबकि ब्लॉग लिखने से मिलता क्या है… धेला-पत्थर, कुछ तारीफ़ें-कुछ गालियाँ, अब बताइये कौन सा सौदा बेहतर है?


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Monday, 17 March, 2008

अमेरिकी फ़ंडा : ॠण लेकर घी पियो, अर्थव्यवस्था मजबूत होगी…

American Sub Prime Crisis Indian Economy

जी, मैं कोई मजाक नहीं कर रहा। हालांकि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ, लेकिन “अमेरिकी रिसेशन” (बाजारों की मंदी) नाम का भूत जब सारी दुनिया को डराता हुआ घूम रहा है, उसके पीछे यही चार्वाक नीति काम कर रही है। अमेरिकी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने ज्यादा कमाई और ब्याज के लालच में ऐसे-ऐसे लोगों को भी ॠण बाँट दिये जिनकी औकात उतनी थी नहीं, यही है अमेरिकी सब-प्राइम संकट, सरल भाषा में। मंदी छाई हुई है अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर, लेकिन घिग्घी बंधी हुई है हमारी और हमारे शेयर बाजारों की। ऐसा क्यों होता है?

“बचत करना पाप है, खर्च करना गुण है…” एक महान अर्थशास्त्री का यह बयान अमेरिका पर कितना सटीक बैठता है, आइये देखते हैं। आमतौर पर मान्यता है कि जापानी व्यक्ति बेहद कंजूस होता है और बचत में अधिक विश्वास करता है। जापानी अधिक खर्च नहीं करते, जापान की वार्षिक बचत लगभग सौ अरब है, फ़िर भी जापानी अर्थव्यवस्था कमजोर मानी जाती है। दूसरी ओर अमेरिकी खर्चते ज्यादा हैं, बचाते कम हैं, यहाँ तक कि अमेरिका निर्यात से अधिक आयात करता है, उसका व्यापार घाटा चार सौ अरब को पार कर चुका है। फ़िर भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत मानी जाती है और सारी दुनिया उसकी सेहत के लिये फ़िक्रमन्द रहती है।

अब सवाल उठता है कि अमेरिकी लोग खर्च करने के लिये इतना पैसा लाते कहाँ से हैं? असल में वे उधार लेते हैं, जापान से, चीन से, भारत से और भी वहाँ से जहाँ के लोग बचत करते हैं। बाकी सारे देश बचत करते हैं, ताकि अमेरिका उसे खर्च कर सके, क्योंकि लगभग सारे देश अपनी बचत डॉलर या सोने में करते हैं। अकेले भारत ने ही अपनी विदेशी मुद्रा को लगभग 50 अरब डालर की अमेरिकी प्रतिभूतियों में सुरक्षित रखा हुआ है, चीन का आँकड़ा 160 अरब डॉलर का है। अमेरिका ने पूरे विश्व से पाँच खरब डॉलर लिये हुए हैं, इसलिये जैसे-जैसे बाकी का विश्व बचत करता जाता है, अमेरिकी उतनी ही उन्मुक्तता से खर्च करते जाते हैं। चीन ने जितना अमेरिका में निवेश किया हुआ है उसका आधा भी अमेरिका ने चीन में नहीं किया, यही बात भारत के साथ भी है, हमने अमेरिका में लगभग 50 अरब डॉलर निवेश किया है, जबकि अमेरिका ने भारत में 20 अरब डॉलर।

फ़िर सारी दुनिया अमेरिका के पीछे क्यों भाग रही है? इसका रहस्य है अमेरिकियों की खर्च करने की प्रवृत्ति। वे लोग अपने क्रेडिट कार्डों से भी बेतहाशा खर्च करते हैं, जो कि उनकी भविष्य की आमदनी है, इसीलिये अमेरिका निर्यात कम करता है, आयात अधिक करता है, नतीजा – सारा विश्व अपने विकास के लिये अमेरिका के खर्चों पर निर्भर होता है। यह ठीक इस प्रकार है कि जैसे कोई दुकानदार किसी ग्राहक को उधा